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योजनाओं का लाभ किसे? मोदी सरकार को आंकड़ों के साथ देना होगा जवाबWho benefits from these schemes? The Modi government will have to answer with data.

 


 प्रणव बजाज

सरकारी योजनाएं, मुस्लिम समाज और बहुसंख्यक वर्ग की नाराजगी: आंकड़े क्या कहते हैं?

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली सरकार अक्सर दावा करती है कि उसकी योजनाएं "सबका साथ, सबका विकास, सबका विश्वास" के सिद्धांत पर आधारित हैं। सरकार यह भी कहती है कि योजनाओं का लाभ बिना भेदभाव हर पात्र नागरिक तक पहुंचाया जा रहा है। लेकिन जमीनी स्तर पर कई सवाल आज भी उठ रहे हैं और इन सवालों का जवाब केवल राजनीतिक भाषणों से नहीं बल्कि सार्वजनिक आंकड़ों से दिया जाना चाहिए।


देश में एक बड़ा वर्ग यह जानना चाहता है कि प्रधानमंत्री आवास योजना, आयुष्मान भारत, उज्ज्वला योजना, जनधन योजना, छात्रवृत्ति योजनाओं और अन्य कल्याणकारी कार्यक्रमों का वास्तविक लाभ किस वर्ग तक कितना पहुंचा है। क्या सरकार धर्म, क्षेत्र और सामाजिक-आर्थिक आधार पर लाभार्थियों का विस्तृत डेटा सार्वजनिक करेगी

अल्पसंख्यक कल्याण से जुड़ी योजनाओं में मुस्लिम समाज सबसे बड़ा लाभार्थी वर्ग माना जाता है। सरकार का तर्क है कि यह उनकी जनसंख्या और सामाजिक-शैक्षणिक स्थिति के कारण है। वहीं दूसरी ओर हिंदू समाज के कुछ वर्गों में यह धारणा भी देखने को मिलती है कि योजनाओं का लाभ वितरण पूरी तरह पारदर्शी नहीं है। इन धारणाओं की सच्चाई का पता केवल आधिकारिक आंकड़ों से ही चल सकता है।

वोट बैंक की राजनीति भारतीय लोकतंत्र का पुराना विषय रही है। विपक्ष पर हो या सत्तापक्ष पर, विभिन्न दलों पर समय-समय पर अलग-अलग समुदायों को साधने के आरोप लगते रहे हैं। ऐसे में मोदी सरकार के सामने भी यह जिम्मेदारी है कि वह सभी प्रमुख योजनाओं का विस्तृत लाभार्थी डेटा सार्वजनिक कर यह साबित करे कि योजनाओं का लाभ पूरी निष्पक्षता से दिया जा रहा है।

सरकारी अस्पतालों, छात्रवृत्ति, आवास और सामाजिक सुरक्षा योजनाओं को लेकर भी लोगों के मन में कई सवाल हैं। यदि व्यवस्था पूरी तरह पारदर्शी है तो सरकार को आंकड़ों के माध्यम से जनता को भरोसा दिलाना चाहिए। इससे भ्रम, अफवाह और राजनीतिक आरोप—तीनों कम होंगे।

अल्पसंख्यक कल्याण से जुड़ी योजनाओं में मुस्लिम समाज सबसे बड़ा लाभार्थी वर्ग रहा है। सरकार का तर्क है कि यह उनकी आबादी और सामाजिक-शैक्षणिक जरूरतों के कारण है। दूसरी ओर आलोचकों का कहना है कि योजनाओं का आधार केवल आर्थिक स्थिति होना चाहिए, धर्म नहीं।

देश के अनेक हिस्सों में यह धारणा भी सुनाई देती है कि गरीब हिंदू परिवारों को उतनी जानकारी या सहायता नहीं मिल पाती जितनी योजनाओं के प्रति जागरूक अन्य वर्गों को मिलती है। यह धारणा सही है या गलत, इसका निर्णय भावनाओं से नहीं बल्कि सरकारी आंकड़ों से होना चाहिए।

स्वास्थ्य सेवाओं को लेकर भी लोगों के बीच विभिन्न प्रकार की शिकायतें सुनने को मिलती हैं। कुछ लोग दावा करते हैं कि सरकारी अस्पतालों में सुविधाओं के वितरण में असमानता है। यदि ऐसा है तो इसकी निष्पक्ष जांच होनी चाहिए। यदि ऐसा नहीं है तो सरकार को पारदर्शी डेटा जारी कर जनता के भ्रम दूर करने चाहिए।

लोकतंत्र में जनता को सवाल पूछने का अधिकार है और सरकार का दायित्व जवाब देना। इसलिए अब समय आ गया है कि योजनाओं के लाभार्थियों से जुड़ी अधिकतम जानकारी सार्वजनिक की जाए, ताकि देश में चल रही बहस का फैसला भावनाओं से नहीं बल्कि तथ्यों और आंकड़ों के आधार पर हो सके।

सच यह है कि पारदर्शिता से किसी सरकार को डरना नहीं चाहिए। आंकड़े सामने आएंगे तो जनता स्वयं तय कर लेगी कि योजनाओं का लाभ किसे मिला और किसे नहीं। लोकतंत्र में यही सबसे बड़ी ताकत है।

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