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ईरान की आर्थिक नाकेबंदी: अमेरिका दबाव बढ़ा रहा है, तेहरान की ‘नई व्यवस्था’ कितनी टिकेगी?



सम्पादकीय :प्रणव बजाज

ईरान के खिलाफ अमेरिका की आर्थिक घेराबंदी अब केवल प्रतिबंधों की सूची तक सीमित नहीं रह गई है। तेल से लेकर जहाजरानी, वित्तीय नेटवर्क, विमानन, तकनीक, सोना और डिजिटल संपत्तियों तक दबाव का दायरा फैलाया जा रहा है। ऐसे समय में ईरानी राष्ट्रपति मसूद पेजेशकियन का यह कहना कि तेहरान ने “नई व्यवस्था” अपना ली है, असल में एक बड़े आर्थिक संघर्ष की स्वीकारोक्ति भी है।


अमेरिका का दावा है कि उसका अभियान ईरानी शासन और इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स तक पहुंचने वाले आर्थिक रास्तों को बंद करने के लिए है। वाशिंगटन ईरान पर आतंकवाद के समर्थन और प्रतिबंधों से बचने के लिए तेल तथा दूसरे नेटवर्क के इस्तेमाल के आरोप लगाता रहा है। दूसरी तरफ तेहरान इसे सीधे तौर पर ईरानी जनता पर आर्थिक दबाव बनाने की रणनीति बताता है।


यहां सबसे बड़ा सवाल है—आखिर आर्थिक युद्ध की कीमत कौन चुका रहा है? प्रतिबंध सरकार और सैन्य नेटवर्क को निशाना बनाने के नाम पर लगाए जाते हैं, लेकिन उनका असर अक्सर आम नागरिकों, कारोबारियों और जरूरी सेवाओं तक पहुंचता है। ईरानी विमानन क्षेत्र इसका उदाहरण है। पहले से प्रतिबंधों के कारण नए विमान, कलपुर्जे और रखरखाव सेवाओं की मुश्किल झेल रहा यह क्षेत्र अब और दबाव में आ सकता है।


पेजेशकियन सरकार के सामने चुनौती केवल अमेरिका के प्रतिबंधों का सामना करने की नहीं, बल्कि अर्थव्यवस्था को चलते रखने की है। “जनता हमारे साथ है” कहना राजनीतिक संदेश हो सकता है, लेकिन बाजार में महंगाई, मुद्रा पर दबाव और कारोबार की मुश्किलों का जवाब केवल नारों से नहीं दिया जा सकता।


अमेरिका की रणनीति स्पष्ट दिखती है—ईरान की कमाई के रास्ते बंद करो, वित्तीय नेटवर्क काटो और प्रतिबंधों की कीमत बढ़ाओ। ईरान की चुनौती भी उतनी ही स्पष्ट है—वैकल्पिक व्यापार, भुगतान और आर्थिक नेटवर्क खड़े करना।


लेकिन इस टकराव का सबसे खतरनाक पहलू यही है कि आर्थिक प्रतिबंध अब कूटनीति का औजार कम और आर्थिक युद्ध का हथियार ज्यादा दिखाई दे रहे हैं। सवाल सिर्फ यह नहीं कि ईरान कितने समय तक दबाव झेल पाएगा; सवाल यह भी है कि इस आर्थिक युद्ध का बिल आखिर किसके नाम आएगा—सत्ता के या आम ईरानी नागरिक के?

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