सवाल—इतनी कार्रवाई के बाद भी नेटवर्क क्यों जिंदा?
प्रणव बजाज
मध्यप्रदेश में डॉ. मोहन यादव सरकार के कार्यकाल में शराब को लेकर तस्वीर दो हिस्सों में दिखाई देती है। एक तरफ आबकारी विभाग लगातार छापे, जब्ती और प्रकरण दर्ज करने के आंकड़े पेश करता है; दूसरी तरफ नकली शराब की फैक्ट्रियां, अंतरराज्यीय तस्करी और अब सागर की भयावह त्रासदी यह सवाल खड़ा करती है कि आबकारी तंत्र की रोकथाम आखिर कितनी प्रभावी है?
सरकारी आंकड़ों के मुताबिक सिर्फ रायसेन जिले में 1 अप्रैल से दिसंबर 2025 तक अवैध शराब के 1,557 न्यायालयीन प्रकरण दर्ज हुए। श्योपुर में अप्रैल 2024 से संबंधित प्रश्न के समय तक 232 प्रकरण दर्ज होने की जानकारी विधानसभा में दी गई। यानी समस्या कुछ गांवों या एक-दो शराब माफियाओं तक सीमित नहीं है।
लेकिन इन हजारों छोटे-बड़े प्रकरणों के बीच कुछ घटनाएं ऐसी हैं जो सिस्टम की असली परीक्षा बन जाती हैं।
1. सागर: सबसे गंभीर परीक्षा—लाइसेंस, पहचान और जहरीली शराब
सितंबर 2026 का सागर-बंडा शराबकांड अब तक मोहन सरकार के सामने सबसे गंभीर शराब त्रासदियों में से एक बन गया है। मौतों का आंकड़ा रिपोर्टों में लगातार बढ़ता रहा और ताजा रिपोर्टिंग में 32 मौतों तक की बात सामने आई है।
जांच में कथित अंतरराज्यीय सप्लाई चेन, नकली ब्रांडिंग और शराब के निर्माण की कड़ियां सामने आईं। एक जांच में गुजरात के अहमदाबाद से स्प्रिट और उत्तर प्रदेश के ललितपुर से नकली रैपर/क्यूआर कोड की कड़ी भी जांच के दायरे में आई है।
पुलिस ने 30 आरोपियों को नामजद किया और शुरुआती कार्रवाई में 14 गिरफ्तारियां होने की रिपोर्ट सामने आई। तीन आबकारी अधिकारियों और दो पुलिसकर्मियों को निलंबित किया गया तथा क्षेत्र के वरिष्ठ स्तर पर भी प्रशासनिक बदलाव किए गए।
यहां सबसे बड़ा सवाल है—यदि नकली शराब का नेटवर्क सक्रिय था तो लाइसेंसिंग, पुलिस सत्यापन और आबकारी निगरानी में यह पहले क्यों नहीं पकड़ा गया?
सागर में जिन अधिकारियों की जवाबदेही जांच के घेरे में आई
यहां एक महत्वपूर्ण अंतर रखना जरूरी है। नीचे दिए नामों को मैं “शराब कांड में लिप्त अधिकारी” नहीं कह रहा हूं। उपलब्ध रिकॉर्ड में उनके खिलाफ कार्रवाई/प्रशासनिक भूमिका सामने आई है; दोष सिद्ध होना अलग विषय है।
प्रतिभा पाल — सागर कलेक्टर, घटना के समय जिला प्रशासन की प्रमुख अधिकारी।
अनुराग सुजानिया — सागर एसपी, घटना के समय पुलिस प्रमुख।
आरती यादव — बंडा एसडीएम, जिन्हें मामले के बाद हटाए जाने की रिपोर्ट सामने आई।
सागर के तीन आबकारी अधिकारी निलंबित किए गए; उपलब्ध रिपोर्टों में सहायक आबकारी आयुक्त समेत तीन अधिकारियों पर कार्रवाई की पुष्टि है।
क्षेत्रीय उपायुक्त स्तर के अधिकारी को मुख्यालय अटैच किए जाने की रिपोर्ट सामने आई है।
बाद में इरशाद वली को सागर आईजी की जिम्मेदारी दी गई और दिलीप कुमार को संभागायुक्त बनाया गया। ये दोनों कार्रवाई के बाद नियुक्त किए गए अधिकारी हैं, इसलिए इन्हें पुराने नेटवर्क की लापरवाही से जोड़ना गलत होगा।
2. इंदौर: नकली शराब की फैक्टरी—एक साल तक चलता रहा खेल?
जून 2026 में इंदौर में आबकारी विभाग ने एक कथित नकली शराब फैक्टरी पकड़ी। रिपोर्ट के अनुसार फैक्टरी करीब एक साल से चल रही थी, 144 बल्क लीटर अवैध शराब जब्त हुई और अरविंद पटवाले को मुख्य आरोपी के रूप में गिरफ्तार किया गया। कार्रवाई में आबकारी अधिकारी देवेंद्र चतुर्वेदी का नाम सामने आया।
यह मामला इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि सवाल केवल यह नहीं कि फैक्टरी पकड़ी गई या नहीं।
सवाल यह है कि अगर यह इकाई लगभग एक साल से चल रही थी तो स्थानीय निगरानी तंत्र को इसकी जानकारी पहले क्यों नहीं मिली?
3. ग्वालियर: फार्म हाउस में नकली शराब फैक्टरी
2025 में ग्वालियर में एक फार्म हाउस से नकली शराब फैक्टरी पकड़े जाने की रिपोर्ट सामने आई। सुनीता जाट, मोहित उर्फ मोनू तोमर, सुमित जाट, प्रीतम जाट और दीपक जाट को गिरफ्तार किए जाने की जानकारी दी गई। पुलिस के अनुसार नेटवर्क में हरियाणा के तस्करों की भूमिका भी सामने आई।
फार्म हाउस कथित तौर पर पूर्व कांग्रेस नेता सुरेंद्र तोमर का बताया गया था और उसे किराये पर लेकर फैक्टरी चलाए जाने की बात सामने आई। यह राजनीतिक संरक्षण का प्रमाण नहीं है; इसकी पुष्टि जांच से ही हो सकती है। लेकिन इतना जरूर है कि इतनी बड़ी अवैध इकाई का संचालन स्थानीय निगरानी की क्षमता पर सवाल खड़ा करता है।
4. शिवपुरी: फैक्टरी से लेकर गांवों तक अवैध शराब
मोहन सरकार के कार्यकाल में शिवपुरी में भी लगातार अवैध शराब के प्रकरण सामने आए।
जनवरी 2024 में आबकारी विभाग ने हाईवे पर लोडिंग वाहन से करीब 4.30 लाख रुपये का अवैध शराब-संबंधी माल जब्त किया और एक आरोपी गिरफ्तार किया। कार्रवाई में आबकारी उपनिरीक्षक तीर्थराज भारद्वाज तथा आबकारी आरक्षक सतीश जयंत और रितिक धाकड़ के नाम सामने आए।
फरवरी 2024 में कोलारस क्षेत्र के हरिपुर में कच्ची शराब निर्माण पर कार्रवाई हुई और दो आरोपियों को गिरफ्तार कर जेल भेजा गया। उस कार्रवाई के संदर्भ में जिला आबकारी अधिकारी संजय कुमार गुप्ता और उपनिरीक्षक तीर्थराज भारद्वाज के नाम दर्ज हैं।
2025 में स्वतंत्रता दिवस के ड्राई-डे पर शिवपुरी में अलग-अलग स्थानों पर छापों के दौरान 29 प्रकरण दर्ज किए गए और 57.13 बल्क लीटर शराब जब्त हुई। कार्रवाई जिला आबकारी अधिकारी शुभम दांगोड़े के निर्देशन में बताई गई।
2026 में करैरा में खेत के कमरे से 216 बल्क लीटर अवैध शराब बरामद कर कमलेश राय को गिरफ्तार किए जाने की रिपोर्ट सामने आई।
यहां भी कहानी वही है—कार्रवाई होती है, आरोपी पकड़े जाते हैं, लेकिन अगले साल फिर नया ठिकाना सामने आ जाता है।
5. शिवपुरी से आगे—अवैध शराब बनाने की पूरी कच्ची फैक्टरी
फरवरी 2024 के एक मामले में हाईकोर्ट के रिकॉर्ड में शिवपुरी के करेरा क्षेत्र में अवैध शराब निर्माण के लिए 150 लीटर ओवरप्रूफ स्पिरिट, 25 कार्टन शराब, 50 हजार रैपर, 50 हजार खाली क्वार्टर बोतलें, 40 हजार ढक्कन और पैकिंग सामग्री बरामद होने का उल्लेख है।
इस मामले में राजेश सिंह, सत्येंद्र लोधी, बृजकिशोर, भाव सिंह, महाजन, जितेंद्र सिंह और रामजी लाल गिरफ्तार बताए गए। पंकज लोधी के फरार होने की जानकारी भी अदालत के रिकॉर्ड में है।
यह साधारण अवैध बिक्री नहीं थी। बरामद सामग्री से संकेत मिलता है कि वहां निर्माण और पैकेजिंग की व्यवस्थित तैयारी थी।
6. 2024 में उज्जैन का पुराना जहर नेटवर्क भी अदालत तक पहुंचा
यह मामला मोहन सरकार से पहले का अपराध है, लेकिन इसकी न्यायिक कार्रवाई उनके कार्यकाल में भी चली। 2020 के उज्जैन जहरीली शराब मामले में अदालत के रिकॉर्ड के अनुसार 16 लोगों की मौत हुई थी। जांच में स्पिरिट की खरीद और नकली शराब निर्माण की पूरी श्रृंखला सामने आई थी।
अदालत के रिकॉर्ड में यूनुस खान, सिकंदर, गब्बर उर्फ अब्दुल, शकील, सिकंदर उर्फ संदीप उर्फ भूरा, याहिया खान उर्फ पप्पी लंगड़ा और मुन्ना उर्फ मोहम्मद सगीर समेत कई आरोपियों के नाम आए। स्पिरिट सप्लाई से जुड़े जितेंद्र मुकाती तथा केमिकल कंपनी से जुड़े अजाज हुसैन, संजय शर्मा, रूपेश शर्मा और रामलखन की गिरफ्तारी का भी रिकॉर्ड है।
इसे मोहन सरकार की घटना कहना गलत होगा, लेकिन यह बताता है कि मध्यप्रदेश में जहरीली शराब का नेटवर्क कोई नया खतरा नहीं है।
सबसे बड़ा सवाल: अपराधी पकड़े जा रहे हैं, लेकिन नेटवर्क क्यों नहीं टूट रहा?
उपलब्ध रिकॉर्ड से यह कहना गलत होगा कि मोहन सरकार में हर शराब माफिया बच गया। इसके उलट कई मामलों में आरोपी गिरफ्तार हुए, बड़ी मात्रा में शराब और कच्चा माल जब्त हुआ और विभागीय कार्रवाई भी हुई।
लेकिन समस्या का दूसरा पहलू ज्यादा गंभीर है।
रायसेन—1,557 प्रकरण।
श्योपुर—232 प्रकरण।
शिवपुरी—बार-बार अवैध निर्माण और परिवहन।
इंदौर—कथित नकली फैक्टरी।
ग्वालियर—फार्म हाउस में नकली शराब निर्माण।
और सागर—मौतों की भयावह त्रासदी।
इन आंकड़ों को एक साथ रखने पर सवाल सिर्फ पुलिस कार्रवाई का नहीं, रोकथाम के मॉडल का बनता है।
आबकारी विभाग स्वयं कहता है कि उसकी जिम्मेदारी शराब के निर्माण, परिवहन, वितरण, बिक्री और खरीद से जुड़े नियमों का प्रवर्तन है।
फिर सवाल सीधा है—
यदि विभाग की जिम्मेदारी पूरी सप्लाई चेन पर निगरानी की है तो नकली शराब की फैक्टरी बनने, स्पिरिट पहुंचने, बोतल-रैपर तैयार होने और गांवों तक माल पहुंचने के बाद ही कार्रवाई क्यों होती है?
900 से ज्यादा पद खाली—लेकिन क्या सिर्फ स्टाफ की कमी जिम्मेदार है?
ताजा रिपोर्ट के अनुसार आबकारी विभाग में 900 से अधिक पद रिक्त हैं और प्रतिदिन लगभग 1,400 लीटर अवैध शराब जब्त होने की बात सामने आई है।
स्टाफ की कमी निश्चित रूप से निगरानी को प्रभावित कर सकती है। लेकिन सागर जैसी घटना में यह अकेला जवाब नहीं हो सकता।
अगर शिकायत पहले पहुंची थी और विभागीय आदेशों में संदिग्ध शराब के स्टॉक को रोकने/जब्त करने और जांच कराने से लेकर बाद में कार्रवाई की जरूरत नहीं बताने तक बदलाव हुआ था, तो यह प्रशासनिक निर्णय-श्रृंखला की जांच का विषय है। इंडियन एक्सप्रेस ने सागर मामले में ऐसे आदेशों के बदलाव की रिपोर्ट की है।
अधिकारियों की ‘लिप्तता’ पर सावधानी जरूरी
यहां एक बात स्पष्ट है—किसी अधिकारी का किसी जिले में पदस्थ होना या किसी कार्रवाई का प्रभारी होना उसे शराब माफिया से लिप्त साबित नहीं करता।
इसलिए उपलब्ध दस्तावेजों के आधार पर अधिकारियों को तीन श्रेणियों में देखना चाहिए:
1. जिन पर विभागीय कार्रवाई हुई: सागर के तीन आबकारी अधिकारी, क्षेत्रीय उपायुक्त स्तर के अधिकारी तथा संबंधित पुलिसकर्मी।
2. जिनकी प्रशासनिक भूमिका की जांच होनी चाहिए: घटना के समय के जिला/पुलिस/आबकारी पर्यवेक्षण अधिकारी—यह जांच का विषय है, दोष का निष्कर्ष नहीं।
3. जिनके नाम केवल कार्रवाई करने वाले अधिकारी के रूप में आए: जैसे देवेंद्र चतुर्वेदी, संजय कुमार गुप्ता, शुभम दांगोड़े और तीर्थराज भारद्वाज। इनके नाम कार्रवाई में आए हैं; उपलब्ध स्रोतों में इनके खिलाफ सागर जैसी विभागीय कार्रवाई का प्रमाण नहीं मिला।
यही फर्क खबर को खोजी रिपोर्ट और महज आरोप-पत्र के बीच अलग करता है।
मोहन सरकार के सामने अब असली सवाल
सरकार अगर वास्तव में शराब माफिया पर निर्णायक प्रहार करना चाहती है तो सिर्फ हर घटना के बाद छापे और निलंबन पर्याप्त नहीं होंगे।
उसे सार्वजनिक करना चाहिए—
2024 से अब तक जिलेवार कितने अवैध शराब प्रकरण दर्ज हुए?
कितने आरोपी गिरफ्तार हुए?
कितनों पर चार्जशीट दाखिल हुई?
कितनों को सजा हुई?
कितने लाइसेंस रद्द हुए?
कितने आबकारी अधिकारियों पर विभागीय कार्रवाई हुई?
कितने अधिकारी जांच के बावजूद फील्ड पोस्टिंग में बने रहे?
और कितने मामलों में शराब का स्रोत पकड़ा गया?
यही वह डेटा है जो बताएगा कि सरकार शराब माफिया से लड़ रही है या केवल शराब माफिया के पकड़े जाने के बाद प्रतिक्रिया दे रही है।
सागर में बुलडोजर चल गया। गिरफ्तारियां हो गईं। अधिकारी निलंबित हो गए। अब अगली कसौटी है—
क्या सरकार उस व्यवस्था को भी कटघरे में खड़ा करेगी जिसने अवैध शराब को बाजार तक पहुंचने से पहले नहीं रोका?
क्योंकि मकान गिराने से शराब का नेटवर्क नहीं टूटता। नेटवर्क तब टूटता है जब लाइसेंस, पैसा, स्पिरिट, पैकेजिंग, परिवहन, बिक्री और संरक्षण—हर कड़ी की जांच एक साथ होती है।
सागर की 32 मौतें सिर्फ एक शराबकांड नहीं हैं; यह मध्यप्रदेश के आबकारी मॉडल की सबसे कठिन परीक्षा है।

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