विशेष रिपोर्ट | प्रणव बजाज
इंदौर। देश में स्वच्छता के मॉडल के तौर पर पहचान बना चुके इंदौर की सड़क व्यवस्था अब एक अलग सवाल खड़ा कर रही है—सड़क निर्माण पर पैसा लगातार खर्च होने के बाद भी सड़कें टिक क्यों नहीं रही हैं?
मामला केवल गड्ढों या बारिश में सड़क टूटने तक सीमित नहीं है। नगर निगम के सड़क निर्माण और पैचवर्क की व्यवस्था में टेंडर, री-टेंडर, ठेकेदारों की उपलब्धता, निर्माण गुणवत्ता, इंजीनियरों की निगरानी और भुगतान—हर स्तर पर सवाल उठ रहे हैं।
हालिया स्थिति में कई सड़क और पैचवर्क कार्यों के लिए ठेकेदारों की पर्याप्त भागीदारी नहीं मिलने से री-टेंडरिंग की जरूरत पड़ रही है। दूसरे सरकारी विभागों में काम करने वाले ठेकेदारों को भी सड़क कार्यों में आने के लिए तैयार करने की कोशिश की जा रही है। यह स्थिति अपने आप में निगम की टेंडर व्यवस्था की पड़ताल मांगती है।
391 करोड़ की 22 सड़कें... फिर सवाल क्यों?
सितंबर 2024 में इंदौर में 22 सड़कों के निर्माण के लिए करीब ₹391 करोड़ के चार पैकेज के टेंडर खुलने की रिपोर्ट सामने आई थी।
इसके पहले करीब ₹468 करोड़ के सड़क ठेकों में ठेकेदारों के कथित समूह/रिंग बनाकर ठेके लेने का मामला भी चर्चा में रहा था।
यहीं से असली सवाल शुरू होता है—
यदि बड़े सड़क पैकेजों के लिए करोड़ों रुपये के टेंडर निकाले जा रहे हैं, तो छोटे और मध्यम सड़क-पैचवर्क के टेंडरों में ठेकेदार क्यों नहीं आ रहे?
क्या निगम की दरें बाजार के हिसाब से व्यवहारिक नहीं हैं?
क्या भुगतान में देरी होती है?
क्या काम की शर्तें ऐसी हैं कि ठेकेदार जोखिम लेने से बच रहे हैं?
या फिर सड़क निर्माण के ठेकों में प्रतिस्पर्धा की पूरी व्यवस्था की समीक्षा की जरूरत है?
खराब सड़क बनी तो जिम्मेदारी किसकी?
अक्टूबर 2025 में नगर निगम को दो ठेकेदारों पर ₹25-25 हजार का जुर्माना लगाना पड़ा था। वजह थी जोन-1 के राणा प्रताप मार्ग और नवल किशोर रोड पर खराब पैचवर्क, जो कुछ ही दिनों में फिर उखड़ गया। इसी मामले में जेई प्रतिमा यादव का एक दिन का वेतन काटने की कार्रवाई भी हुई थी।
यह घटना बताती है कि गुणवत्ता की निगरानी केवल कागज पर नहीं, सड़क पर होनी चाहिए।
लेकिन सवाल यह है कि ऐसे कितने मामलों में कार्रवाई हुई?
कितने ठेकेदारों पर जुर्माना लगा?
कितने ठेकेदारों को ब्लैकलिस्ट किया गया?
कितने इंजीनियरों की जिम्मेदारी तय हुई?
और कितने मामलों में खराब सड़क दोबारा ठेकेदार के खर्च पर बनवाई गई?
₹6 करोड़ की सड़क और ₹57 लाख का जुर्माना
इंदौर के मालिबु टाउन में करीब ₹6 करोड़ की सड़क के निर्माण में गुणवत्ता संबंधी शिकायत के बाद देशवाल कंस्ट्रक्शन पर ₹57 लाख का जुर्माना लगाए जाने की रिपोर्ट भी सामने आई थी। नगर निगम ने सड़क दोबारा बनाने के निर्देश दिए थे।
यदि निर्माण में कमी सामने आने के बाद इतनी बड़ी पेनल्टी लग सकती है, तो यह सवाल भी जरूरी है कि निर्माण के दौरान गुणवत्ता जांच किस स्तर पर हुई थी?
सड़क टूटने के बाद कार्रवाई करना आसान है। असली प्रशासनिक क्षमता यह है कि खराब सड़क बने ही नहीं।
नगर निगम के सामने अब पूरा ऑडिट जरूरी
इंदौर नगर निगम के पास सड़क निर्माण और रखरखाव की लंबी परियोजना सूची है। मध्यप्रदेश के सरकारी ई-प्रोक्योरमेंट पोर्टल पर निगम के विभिन्न निर्माण कार्यों के टेंडर और उनकी प्रक्रिया दर्ज होती है।
अब जरूरत किसी एक सड़क की जांच की नहीं, बल्कि पूरे सड़क तंत्र के ऑडिट की है।
नगर निगम को पिछले पांच वर्षों के लिए सार्वजनिक करना चाहिए—
कितने सड़क टेंडर निकले?
कुल अनुमानित लागत कितनी थी?
कितने टेंडरों में एक ही बोलीदाता आया?
कितने टेंडर री-टेंडर हुए?
किस ठेकेदार को कितने काम मिले?
कितने काम समय सीमा में पूरे हुए?
कितने कामों की लागत बढ़ी?
कितने ठेकेदारों पर जुर्माना लगा?
कितने काम दोबारा करवाने पड़े?
और सड़क की गुणवत्ता प्रमाणित करने वाले इंजीनियर कौन थे?
महापौर और निगम प्रशासन से सीधे सवाल
नगर निगम के राजनीतिक नेतृत्व में महापौर पुष्यमित्र भार्गव एवं आईएएस क्षितिज सिंघल के पास है। । सड़क, इंजीनियरिंग और ठेका व्यवस्था की प्रशासनिक जवाबदेही निगम के संबंधित अधिकारियों की है। नगर निगम की आधिकारिक वेबसाइट भी उसके प्रशासनिक ढांचे और सार्वजनिक सेवाओं से संबंधित जानकारी उपलब्ध कराती है।
इसलिए सवाल किसी एक अधिकारी पर आरोप लगाने का नहीं, पूरे सिस्टम की जवाबदेही तय करने का है।
अगर ठेकेदार नहीं मिल रहे हैं तो कारण सार्वजनिक किया जाए।
अगर ठेकेदार खराब काम कर रहे हैं तो कार्रवाई का रिकॉर्ड सामने रखा जाए।
अगर इंजीनियरों की निगरानी में कमी है तो जिम्मेदारी तय हो।
और यदि टेंडर व्यवस्था में ही कोई समस्या है तो उसकी समीक्षा हो।
सड़क का गड्ढा अब सिर्फ गड्ढा नहीं
इंदौर में सड़क का हर गड्ढा यह सवाल पूछ रहा है कि जिस काम के लिए पैसा स्वीकृत हुआ, वह जमीन पर कितनी मजबूती से उतरा?
बारिश के बाद पैचवर्क...
फिर नई सड़क...
फिर खुदाई...
फिर मरम्मत...
और फिर नया टेंडर।
अगर यही चक्र चलता रहा तो समस्या सड़क की नहीं, व्यवस्था की है।
इंदौर नगर निगम को अब सड़कवार नहीं, ठेकेदारवार और अधिकारीवार परफॉर्मेंस रिपोर्ट सार्वजनिक करनी चाहिए। इससे साफ होगा कि किस एजेंसी ने कितना काम किया, किसकी सड़क कितने समय चली और कहां सरकारी पैसा दोबारा खर्च करना पड़ा।
क्योंकि शहर को सिर्फ नई सड़क का उद्घाटन नहीं चाहिए।
शहर को ऐसी सड़क चाहिए जिसे अगली बारिश में दोबारा टेंडर की जरूरत न पड़े।

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