फेफड़ों के कैंसर की बात आते ही आमतौर पर धूम्रपान को सबसे बड़ा कारण माना जाता है। लेकिन जो महिलाएं धूम्रपान नहीं करतीं, उनके लिए भी रसोई का धुआं चिंता का विषय हो सकता है—खासकर तब, जब खाना पकाने में लकड़ी, कोयला, उपले, फसल का अवशेष या अन्य ठोस ईंधन इस्तेमाल होता हो और रसोई में पर्याप्त वेंटिलेशन न हो।
विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के अनुसार, घर के भीतर ऐसे ईंधनों के अधूरे दहन से बेहद महीन कण और दूसरे जहरीले प्रदूषक पैदा होते हैं, जो फेफड़ों की गहराई तक पहुंच सकते हैं। लंबे समय तक इसका संपर्क COPD और फेफड़ों के कैंसर सहित कई बीमारियों से जुड़ा है। महिलाओं और बच्चों पर इसका असर अधिक हो सकता है, क्योंकि वे खाना पकाने और घरेलू काम के दौरान धुएं के संपर्क में ज्यादा समय बिताते हैं।
IARC के शोध में भी घरेलू बायोमास ईंधन के धुएं और फेफड़ों के कैंसर के बीच संबंध के प्रमाण मिले हैं। एक समीक्षा में बेहतर नियंत्रित अध्ययनों के आधार पर महिलाओं में जोखिम का अनुमान पुरुषों की तुलना में अधिक पाया गया। हालांकि इसका मतलब यह नहीं कि रसोई में काम करने वाली हर महिला को कैंसर होगा; जोखिम मुख्यतः धुएं की मात्रा, वर्षों तक संपर्क और वेंटिलेशन जैसे कारकों से प्रभावित होता है।
बचाव का सबसे प्रभावी तरीका साफ ईंधन और बेहतर वेंटिलेशन है। LPG, बिजली, बायोगैस जैसे स्वच्छ विकल्पों का इस्तेमाल, चिमनी/एग्जॉस्ट और रसोई में पर्याप्त हवा का आवागमन धुएं का संपर्क घटा सकता है। WHO भी स्वच्छ कुकिंग ईंधन और तकनीक अपनाने पर जोर देता है।

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