पन्ना। मझगांय बांध में लगातार बढ़ते जलस्तर के बीच प्रभावित गांवों के किसानों और आदिवासियों का गुस्सा अब सड़कों पर खुलकर सामने आ गया है। वनहरीकला टपरिया में विस्थापितों ने चिता आंदोलन शुरू कर प्रशासन को सीधा संदेश दिया कि पुनर्वास और मुआवजे के सवाल को अब और टाला नहीं जा सकता। चिता जलाकर प्रदर्शन करना सिर्फ विरोध का तरीका नहीं, बल्कि उस बेचैनी की तस्वीर है जिसमें लोग अपने घर, जमीन और भविष्य को लेकर आशंकित हैं।
केन-बेतवा परियोजना, मझगांय और रुंझ बांध से प्रभावित किसान और आदिवासी एक मंच पर जुटे। प्रदर्शनकारियों की मांग है कि प्रभावित परिवारों को नियमानुसार मुआवजा दिया जाए और पुनर्वास की प्रक्रिया जमीन पर पूरी की जाए। उनका आरोप है कि बांध का पानी बढ़ रहा है, लेकिन जिन लोगों की जमीन और बस्तियां प्रभावित होने वाली हैं, उनके पुनर्वास की प्रक्रिया उसी गति से आगे नहीं बढ़ रही।
सबसे बड़ा सवाल यही है—जब पानी अपना रास्ता बना रहा है तो विस्थापितों के पुनर्वास की फाइलें क्यों अटकी हैं? जिन परिवारों से विकास के नाम पर जमीन ली जा रही है, क्या उन्हें सुरक्षित भविष्य देने की जिम्मेदारी भी सरकार की नहीं है?
प्रशासन के सामने अब सिर्फ आंदोलन संभालने की चुनौती नहीं है। उसे यह भी स्पष्ट करना होगा कि कितने परिवार प्रभावित हैं, कितनों को मुआवजा मिला, कितनों का पुनर्वास बाकी है और बांध का जलस्तर बढ़ने की स्थिति में उनकी सुरक्षा की ठोस योजना क्या है।
विकास जरूरी है, लेकिन विकास की कीमत किसी गरीब की जिंदगी और अस्तित्व नहीं हो सकती।

Post a Comment