सागर की मौतों के बाद भी नहीं जागा सिस्टम, मोहन सरकार से सीधा सवाल—किसके संरक्षण में चल रहा धंधा?
प्रणव बजाज
भोपाल। मध्यप्रदेश में जहरीली शराब से हुई मौतों का दर्द अभी ताजा है और इसी बीच राजधानी भोपाल से सामने आई एक रिपोर्ट ने सरकार और आबकारी विभाग की कार्यप्रणाली पर बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है। रिपोर्ट के मुताबिक राज्य के मंत्रालय के आसपास ही अवैध शराब की बिक्री का खेल चल रहा है। अगर राजधानी के उस इलाके में, जहां सरकार का सबसे बड़ा प्रशासनिक केंद्र मौजूद है, अवैध शराब आसानी से बिकने के आरोप सामने आ रहे हैं, तो प्रदेश के दूरदराज इलाकों में निगरानी की स्थिति का अंदाजा लगाया जा सकता है।
यह सवाल इसलिए और गंभीर है क्योंकि सागर के बंडा क्षेत्र में जहरीली शराब की त्रासदी ने पूरे आबकारी तंत्र को कठघरे में खड़ा कर दिया है। अलग-अलग रिपोर्टों में मौतों का आंकड़ा अलग-अलग चरणों में सामने आया, लेकिन मेथनॉल की मौजूदगी और अवैध शराब नेटवर्क की जांच ने खतरे की भयावहता स्पष्ट कर दी। पुलिस ने अंतरराज्यीय नेटवर्क के खिलाफ कार्रवाई करते हुए कई आरोपियों को गिरफ्तार किया है।
सागर कांड के बाद मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने न्यायिक जांच के आदेश दिए और अवैध शराब के खिलाफ प्रदेशव्यापी कार्रवाई के निर्देश भी दिए। संभाग स्तर पर अधिकारियों में बदलाव और पुलिस कार्रवाई भी हुई। लेकिन राजधानी में अवैध बिक्री की रिपोर्ट सामने आना बताता है कि छापे और गिरफ्तारियां अलग बात हैं, जमीनी निगरानी अलग।
शराब नीति पर भी बड़ा सवाल
2026-27 की आबकारी नीति में सरकार ने नई शराब दुकानें नहीं खोलने का फैसला किया है। नर्मदा किनारे पांच किलोमीटर के दायरे और निर्धारित पवित्र नगरों में शराब दुकानों पर प्रतिबंध भी बरकरार रखा गया है। यानी सरकार ने कागज पर नियंत्रण और प्रतिबंधों की व्यवस्था बनाई है।
लेकिन असली सवाल नीति का नहीं, उसके क्रियान्वयन का है।
यदि लाइसेंसी दुकानों की निगरानी हो रही है और अवैध कारोबार के खिलाफ अभियान चल रहा है, फिर मंत्रालय के सामने अवैध शराब कैसे पहुंच रही है? कौन बेच रहा है? किसके संरक्षण में बेच रहा है? स्थानीय आबकारी अमले को इसकी जानकारी क्यों नहीं मिली? और अगर जानकारी मिली थी तो कार्रवाई कहां है?
क्या मध्यप्रदेश में शराबबंदी की मांग अब नई बहस बनेगी?
सागर की मौतों के बाद शराब की उपलब्धता और नियंत्रण पर बहस तेज होना स्वाभाविक है। मध्यप्रदेश में पूर्ण शराबबंदी की मांग लंबे समय से अलग-अलग सामाजिक और राजनीतिक मंचों से उठती रही है। लेकिन शराबबंदी केवल घोषणा से नहीं होती—इसके लिए वैकल्पिक राजस्व व्यवस्था, अवैध तस्करी पर कठोर नियंत्रण और सीमा-पार नेटवर्क पर प्रभावी कार्रवाई भी जरूरी होगी।
सबसे खतरनाक स्थिति वह है जिसमें कानूनी शराब की दुकानें मौजूद हों और उसी समानांतर अवैध शराब का बाजार भी फलता रहे। तब न नीति पूरी तरह नियंत्रण कर पाती है, न प्रशासन।
और यही मोहन सरकार के सामने सबसे कठिन सवाल है—
सागर में मौतें हो गईं। आरोपी पकड़े जा रहे हैं। न्यायिक जांच बैठ गई। प्रदेशव्यापी अभियान के आदेश भी हो गए। फिर राजधानी के मंत्रालय के सामने अवैध शराब बिकने की नौबत कैसे आई?
सरकार को यह स्पष्ट करना होगा कि यह सिर्फ स्थानीय स्तर की लापरवाही है या आबकारी तंत्र की कोई बड़ी कमजोरी।
जनता शराब के राजस्व से ज्यादा अपने परिवार की सुरक्षा चाहती है। अगर सरकार शराब से राजस्व लेती है तो कम-से-कम अवैध शराब से नागरिकों की जान जाने की जिम्मेदारी से बच नहीं सकती।
मध्यप्रदेश को अब सिर्फ शराब नीति नहीं, शराब व्यवस्था पर जवाब चाहिए।

Post a Comment