हरतालिका तीज को माता पार्वती और भगवान शिव के अटूट प्रेम और तपस्या का पर्व माना जाता है। धार्मिक मान्यता के अनुसार इस दिन कुंवारी कन्याएं मनचाहा वर पाने और विवाहित महिलाएं सुखी वैवाहिक जीवन तथा अखंड सौभाग्य की कामना से व्रत रखती हैं। हरतालिका तीज की कथा में माता पार्वती की कठिन तपस्या और उनके संकल्प का विशेष महत्व बताया गया है।
पौराणिक कथा के अनुसार माता पार्वती ने भगवान शिव को पति रूप में पाने के लिए कठोर तपस्या की थी। लेकिन उनके पिता हिमवान उनका विवाह भगवान विष्णु से करना चाहते थे। यह जानकर पार्वती बेहद व्यथित हुईं। उनकी सखी उन्हें एक घने वन की गुफा में ले गई, जहां उन्होंने किसी की जानकारी के बिना भगवान शिव को पति रूप में पाने के लिए तपस्या शुरू कर दी।
मान्यता है कि माता पार्वती ने कठिन व्रत रखा और रेत से भगवान शिव की प्रतिमा बनाकर उनकी आराधना की। उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने उन्हें पत्नी के रूप में स्वीकार करने का वरदान दिया।
‘हरतालिका’ नाम को भी इसी कथा से जोड़ा जाता है। मान्यता के अनुसार माता पार्वती की सखी उन्हें हरण करके वन में ले गई थीं, ताकि उनका विवाह उनकी इच्छा के विरुद्ध न हो। संस्कृत के ‘हरत’ यानी हरण और ‘आलिका’ यानी सखी से ‘हरतालिका’ नाम बनने की धार्मिक व्याख्या की जाती है।
इसी कारण हरतालिका तीज को संकल्प, तपस्या और दांपत्य प्रेम का पर्व माना जाता है। हालांकि ये कथाएं धार्मिक मान्यताओं और पुराण-परंपरा का हिस्सा हैं, इनके अलग-अलग क्षेत्रों में कुछ भिन्न रूप भी मिलते हैं।

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