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बहुमत सरकार को जनादेश देता है, हर सवाल पर अंतिम अधिकार नहीं

विशेष रिपोर्ट | प्रणव बजाज



नई दिल्ली। चुनाव में बहुमत हासिल करना सरकार को शासन करने का संवैधानिक अधिकार देता है, लेकिन लोकतंत्र में बहुमत का अर्थ यह नहीं कि सरकार देश के हर महत्वपूर्ण सवाल पर अकेले अंतिम फैसला कर सकती है। संसद की मूल भूमिका ही यही है कि कानून बनने से पहले उस पर चर्चा, बहस और संसदीय प्रक्रिया के जरिए अलग-अलग मत सामने आएं। संसद की आधिकारिक जानकारी के अनुसार किसी विधेयक को कानून बनने के लिए दोनों सदनों की प्रक्रिया और राष्ट्रपति की स्वीकृति से गुजरना होता है।


संसद इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि देश की आबादी, क्षेत्र, राज्यों और राजनीतिक विचारों का प्रतिनिधित्व एक ही संस्था में समेटना संभव नहीं है। लोकसभा जनता का सदन है, जबकि राज्यसभा राज्यों के प्रतिनिधित्व का मंच है। संविधान ने संसद की शक्तियों को भी संविधान, मौलिक अधिकारों और केंद्र-राज्य शक्तियों के बंटवारे की सीमाओं में रखा है।


ऐसे में सवाल उठता है कि सदस्यों की संख्या बढ़ाने में मुश्किल क्या है? जवाब केवल सीटें बढ़ाने का नहीं है। लोकसभा की सीटों का राज्यों के बीच बंटवारा और निर्वाचन क्षेत्रों का पुनर्समायोजन जनगणना और संवैधानिक प्रावधानों से जुड़ा है। संविधान के अनुच्छेद 81 और 82 में इसका ढांचा दिया गया है और 2026 के बाद की पहली प्रकाशित जनगणना के आंकड़ों से जुड़ी विशेष व्यवस्था भी मौजूद है।


इसलिए बहस सिर्फ “कितनी सीटें हों” की नहीं, बल्कि किसे कितना प्रतिनिधित्व मिले, राज्यों के बीच संतुलन कैसे बना रहे और संसद जनता की विविध आवाजों को कितनी प्रभावी जगह दे—इस व्यापक सवाल की है।

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