नई दिल्ली। हत्या के मामलों में सजा को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने महत्वपूर्ण कानूनी स्थिति स्पष्ट की है। कोर्ट ने कहा है कि सेशन कोर्ट किसी दोषी को आजीवन कारावास की सजा तो दे सकता है, लेकिन वह यह अतिरिक्त निर्देश नहीं दे सकता कि दोषी अपनी प्राकृतिक जिंदगी के अंतिम क्षण तक जेल में ही रहेगा और उसे वैधानिक रिमिशन का लाभ नहीं मिलेगा।
24 सितंबर 2026 के Naval Kishore बनाम State of Punjab मामले में सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि धारा 302 के तहत “imprisonment for life” और ऐसा विशेष आदेश जिसमें दोषी को प्राकृतिक जीवन के अंत तक जेल में रखने तथा रिमिशन से बाहर करने की बात हो—दो अलग कानूनी व्यवस्थाएं हैं। सेशन कोर्ट को दूसरी तरह की विशेष सजा देने का अधिकार नहीं है।
कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि सामान्य आजीवन कारावास का अर्थ कानून में दोषी के शेष प्राकृतिक जीवन तक कारावास हो सकता है, लेकिन उस सजा पर लागू वैधानिक रिमिशन और कम्यूटेशन की व्यवस्था अलग विषय है। विशेष परिस्थितियों में प्राकृतिक जीवन के अंत तक बिना रिमिशन वाली सजा देने की शक्ति संवैधानिक अदालतों—हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट—से जुड़ी है।
इस फैसले में ट्रायल कोर्ट द्वारा लगाए गए “बाकी जिंदगी जेल में” वाले निर्देश को हटाकर सुप्रीम कोर्ट ने दोनों दोषियों की सजा 25 वर्ष के कठोर कारावास, बिना वैधानिक रिमिशन में बदल दी। यानी फैसला सजा खत्म करने का नहीं, बल्कि किस अदालत को किस प्रकार की सजा देने का अधिकार है, इस कानूनी सीमा को स्पष्ट करने का है।

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