उत्तर प्रदेश में चुनावी माहौल से पहले योगी सरकार की महिला-केंद्रित घोषणाओं ने सियासी चर्चा तेज कर दी है। स्कूटी देने की घोषणा हो या महिलाओं के लिए बीमा और अब आसान लोन की योजनाएं—सरकार का फोकस सीधे महिला लाभार्थियों तक आर्थिक मदद पहुंचाने पर दिखाई दे रहा है।
इन घोषणाओं को केवल कल्याणकारी योजनाओं के तौर पर देखा जाए या इनके पीछे चुनावी रणनीति भी है, यह सवाल अब विपक्ष ही नहीं, राजनीतिक विश्लेषकों के बीच भी चर्चा का विषय है। उत्तर प्रदेश में महिला मतदाता चुनावी गणित का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं और पिछले चुनावों में महिला वोटिंग को लेकर राजनीतिक दलों की रणनीति लगातार बदली है।
सरकार की ओर से महिलाओं को आर्थिक रूप से मजबूत करने, रोजगार और स्वरोजगार से जोड़ने तथा आवागमन में सुविधा देने वाली योजनाओं को प्रमुखता दी जा रही है। स्कूटी जैसी घोषणाएं जहां छात्राओं और कामकाजी महिलाओं को लक्ष्य करती हैं, वहीं बीमा और ऋण संबंधी योजनाओं का दायरा आर्थिक सुरक्षा और स्वरोजगार तक पहुंचता है।
हालांकि सवाल यह भी है कि इन घोषणाओं का वास्तविक लाभ कितनी महिलाओं तक पहुंचेगा और इनके लिए बजट में कितना प्रावधान किया गया है। चुनाव से ठीक पहले घोषणाओं की रफ्तार बढ़ने पर यह देखना भी जरूरी होगा कि सरकार का पैसा महिला सशक्तीकरण पर खर्च हो रहा है या चुनावी संदेश मजबूत करने पर।
अगर घोषणाएं धरातल पर उतरती हैं तो महिलाओं को वास्तविक आर्थिक लाभ मिलेगा, लेकिन यदि वे सिर्फ घोषणा-पत्र और मंचों तक सीमित रह गईं तो सवाल उठना तय है कि खजाना महिलाओं के लिए खुला है या वोटों के लिए?
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