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प्रणव बजाज
सागर में जहरीली शराब से हुई मौतों ने एक बार फिर मध्य प्रदेश की शराब व्यवस्था का वह चेहरा सामने ला दिया है, जिसे सरकारी फाइलों में अक्सर दिखाई नहीं देता। बंडा क्षेत्र में मौतों और बड़ी संख्या में लोगों के बीमार पड़ने के बाद जांच का एक महत्वपूर्ण पहलू गांवों में सक्रिय ‘डोरस्टेप डिलीवरी’ नेटवर्क भी बना है। पुलिस के मुताबिक स्थानीय स्तर पर अतिरिक्त पैसे लेकर गांवों तक शराब पहुंचाने की व्यवस्था की जांच हो रही है।
सवाल केवल यह नहीं है कि जहरीली शराब किसने बनाई। असली सवाल यह है कि वह शराब गांव तक पहुंची कैसे?
अगर किसी गांव में शराब घर तक पहुंच रही है, तो फिर आबकारी विभाग की निगरानी कहां है? पुलिस की सूचना व्यवस्था किस काम की है? वैध दुकान से निकलने वाला माल किस रास्ते और किन हाथों से उपभोक्ता तक पहुंच रहा है—इसकी निगरानी कौन करता है?
और सबसे गंभीर बात—जब सागर मामले में संदिग्ध शराब की खेप को लेकर जांच शुरू हुई, तब यह भी सामने आया कि जब्त शराब का स्टॉक एक लाइसेंसी ठेकेदार से खरीदा गया था और उसकी आपूर्ति के रास्ते का पता लगाने के निर्देश दिए गए।
यानी जांच अब केवल ‘नकली शराब बनाने वाले’ तक सीमित नहीं रहनी चाहिए। उसे उस पूरी कड़ी तक पहुंचना होगा—निर्माता से सप्लायर, सप्लायर से ठेकेदार और ठेकेदार से गांव तक।
सरकार ने अधिकारियों को निलंबित कर दिया, एफआईआर दर्ज हुई, गिरफ्तारियां हुईं। लेकिन कार्रवाई का असली पैमाना निलंबन नहीं, बल्कि यह होना चाहिए कि अगली जहरीली बोतल गांव तक पहुंचने से पहले पकड़ी जाए।
क्योंकि सवाल एक सागर का नहीं है। सवाल यह है कि अगर शराब की ‘डोरस्टेप डिलीवरी’ व्यवस्था सचमुच गांवों में जड़ जमा चुकी है, तो क्या मध्य प्रदेश में शराब की दुकानें सिर्फ दुकानें रह गई हैं—या उनका एक अदृश्य विस्तार हर गांव के दरवाजे तक पहुंच चुका है?
**सरकार को शराब माफिया से ज्यादा उस तंत्र की तलाश करनी होगी, जिसने माफिया को रास्ता दिया।**

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