बाजार किसी धर्म की जागीर नहीं, लेकिन हिंदू समाज कब जागेगा?
संपादकीय : प्रणव बजाज
हिंदू समाज को अब एक असुविधाजनक सवाल पूछना ही होगा—हमारे पारंपरिक रोजगार, हमारे बाजार और हमारे कारोबार कमजोर क्यों होते गए?
लेकिन इस सवाल का जवाब केवल “मुसलमानों ने हमारा बाजार छीन लिया” कहकर देना आसान जरूर है ।
यह संपादकीय मेरा व्यक्तिगत मत है और इसका उद्देश्य किसी धर्म के हर व्यक्ति को एक ही नजर से देखना नहीं, बल्कि हिंदू समाज के सामने खड़े एक कठिन सवाल को उठाना है।
कभी हमारे गांव-कस्बों की अर्थव्यवस्था अपने हुनर से चलती थी। हिंदू नाई की दुकान थी, हिंदू मोची जूते बनाता था, बढ़ई फर्नीचर बनाता था, लोहार औजार बनाता था और धोबी कपड़े धोता था। इन पेशों में पीढ़ियों का अनुभव था, ग्राहक से सीधा संबंध था और रोजगार का अपना सम्मान था।
फिर धीरे-धीरे हमारे समाज में एक धारणा बैठाई गई—पढ़ो, डिग्री लो, सरकारी नौकरी पाओ और पारंपरिक काम छोड़ दो।
सरकारी नौकरी बुरी नहीं है। आरक्षण भी संवैधानिक व्यवस्था है। लेकिन सवाल यह है कि क्या हर युवा को सरकारी नौकरी मिल सकती है?
जब नहीं मिल सकती, तो फिर हमने अपने पारंपरिक रोजगार क्यों छोड़े?
आज अनेक शहरों में आधुनिक सैलून, जूते-चप्पल, चमड़े के उत्पाद, वेल्डिंग, फर्नीचर और कपड़ा कारोबार में अलग-अलग समुदायों के नए उद्यमी दिखाई देते हैं। मुस्लिम समाज के भी अनेक कारोबारी इन क्षेत्रों में सफल हुए हैं। उन्होंने बाजार को केवल विरासत नहीं समझा—उन्होंने उसे कारोबार समझा।
यहीं हिंदू समाज को आत्ममंथन करना चाहिए।
अगर कोई हिंदू नाई अपना पुश्तैनी काम छोड़कर वर्षों तक सरकारी नौकरी की प्रतीक्षा करता रहा और उसी दौरान कोई दूसरा व्यक्ति आधुनिक सैलून खोलकर ग्राहक को बेहतर सुविधा देने लगा, तो दोष केवल दूसरे का कैसे?
बाजार खाली जगह को स्वीकार नहीं करता।
जिसने दुकान खोली, पूंजी लगाई, आधुनिक तकनीक अपनाई, ग्राहक को सुविधा दी और जोखिम उठाया—ग्राहक उसके पास जाएगा। इसमें हमें भावनाओं से ज्यादा आर्थिक वास्तविकता को समझना होगा।
लेकिन एक दूसरा सवाल भी उतना ही महत्वपूर्ण है।
क्या राजनीतिक दलों ने गरीब और पिछड़े हिंदू समाज को केवल वोट बैंक समझकर उसके पारंपरिक व्यवसायों के आधुनिकीकरण पर पर्याप्त ध्यान दिया?
नाई को आधुनिक सैलून का प्रशिक्षण क्यों नहीं मिला?
मोची को अपना जूता ब्रांड बनाने के लिए आसान पूंजी क्यों नहीं मिली?
बढ़ई को आधुनिक मशीनें और बाजार क्यों नहीं मिला?
लोहार को छोटे उद्योग में बदलने की योजना क्यों नहीं मिली?
हुनर को जाति की कैद से निकालकर व्यवसाय की शक्ति बनाना होगा।
मेरा सवाल हिंदू समाज से भी है और सरकार से भी।
हम अपने बच्चों को केवल नौकरी खोजने वाला क्यों बनाएं? उन्हें मालिक, उद्यमी और रोजगार देने वाला क्यों नहीं बनाएं?
और मुस्लिम समाज के भीतर जो लोग कारोबार में आगे बढ़े हैं, उनके आर्थिक मॉडल का अध्ययन करने में हमें संकोच क्यों होना चाहिए? प्रतिस्पर्धा से डरने के बजाय हमें प्रतिस्पर्धा करना सीखना होगा।
साथ ही, किसी भी समुदाय के खिलाफ नफरत या बहिष्कार आर्थिक समाधान नहीं है। हिंदू दुकानदार से मुस्लिम ग्राहक खरीद सकता है और मुस्लिम दुकानदार से हिंदू ग्राहक—बाजार का रिश्ता ग्राहक और व्यापारी का है।
इसलिए सवाल यह नहीं कि “मुसलमान बाजार में क्यों बढ़े?”
सवाल यह है—
“हिंदू समाज ने अपने पारंपरिक बाजार को आधुनिक बनाने के लिए क्या किया?”
आरक्षण अपनी जगह है। शिक्षा अपनी जगह है। सरकारी नौकरी अपनी जगह है।
लेकिन हुनर, व्यापार, पूंजी और उद्यमिता भी रोजगार के उतने ही बड़े रास्ते हैं।
जिस दिन हमारा नाई आधुनिक सैलून का मालिक, हमारा मोची जूते के ब्रांड का मालिक, हमारा बढ़ई फर्नीचर उद्योग का मालिक और हमारा लोहार आधुनिक कारखाने का मालिक बनेगा, उस दिन रोजगार की तस्वीर बदल जाएगी।
दूसरे के बाजार पर कब्जे का रोना रोने से पहले अपना बाजार मजबूत करना होगा।
यही आत्ममंथन है।
यही आर्थिक राष्ट्रवाद है।
और यही आने वाली पीढ़ी के लिए सबसे जरूरी सबक है।
इसलिए समाधान यही कि “मुसलमान से मत खरीदो।”

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