जबलपुर। मध्य प्रदेश में आर्थिक अपराधों की जांच करने वाली आर्थिक अपराध प्रकोष्ठ की कार्यप्रणाली पर हाईकोर्ट की तल्ख टिप्पणी ने गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। अभियोजन की स्वीकृति मिलने के करीब पांच वर्ष बाद भी आरोप-पत्र दाखिल नहीं किए जाने पर मध्य प्रदेश हाईकोर्ट की जबलपुर पीठ ने नाराजगी जताई और आर्थिक अपराध प्रकोष्ठ के महानिदेशक उपेंद्र जैन को व्यक्तिगत रूप से तलब किया है। अगली सुनवाई 11 सितंबर को होगी।
मामला रायसेन जिले की बरेली तहसील में छात्रों को साइकिल वितरण से जुड़ा है। सहायक शिक्षक सीमा धाकड़ और उमराव धाकड़ ने आर्थिक अपराध प्रकोष्ठ की प्राथमिकी को चुनौती देते हुए हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया था। याचिका के अनुसार वर्ष 2013 में साइकिल खरीद के लिए छात्रों के खातों में राशि पहुंची थी और संबंधित प्राचार्य ने रकम निकालकर लाभार्थियों को नकद दी थी। बाद में आर्थिक अपराध प्रकोष्ठ ने जांच कर मामला दर्ज किया।
सबसे गंभीर सवाल यहां से शुरू होता है। 2 दिसंबर 2021 को अभियोजन की स्वीकृति मिल चुकी थी, लेकिन इसके बावजूद आरोप-पत्र दाखिल नहीं हुआ। इसी मामले के अन्य आरोपियों का विचारण अगस्त 2023 में समाप्त भी हो चुका है। कोर्ट ने कहा कि इतनी लंबी देरी प्रथम दृष्टया जांच अधिकारी और संबंधित अधिकारियों की भूमिका पर सवाल खड़े करती है और भ्रष्टाचार की आशंका पैदा करती है।
अदालत ने यह भी पूछा कि जांच अधिकारी प्रभावी कार्रवाई करने के बजाय इतने वर्षों तक केवल पत्राचार क्यों करते रहे। यहां तक कि कवरिंग लेटर और अभियोजन स्वीकृति पत्र की तारीखों के अंतर को आरोप-पत्र दाखिल न करने का आधार बनाए जाने पर भी कोर्ट ने स्पष्टीकरण मांगा है।
सवाल सिर्फ एक मुकदमे का नहीं
यह मामला एक महत्वपूर्ण प्रशासनिक सवाल सामने रखता है—अगर किसी जांच एजेंसी को भ्रष्टाचार के मामले में अभियोजन की अनुमति मिल चुकी है, तो आरोप-पत्र दाखिल करने में पांच साल क्यों लगते हैं?
जांच एजेंसी का काम केवल प्राथमिकी दर्ज करना नहीं, बल्कि जांच को तार्किक निष्कर्ष तक पहुंचाना भी है। वर्षों तक मामला लंबित रहने से आरोपी और शिकायतकर्ता दोनों न्यायिक अनिश्चितता में रहते हैं और भ्रष्टाचार विरोधी कार्रवाई की विश्वसनीयता पर भी असर पड़ता है।
अब हाईकोर्ट ने सीधे महानिदेशक को जवाब देने के लिए बुलाया है। इसलिए 11 सितंबर की सुनवाई महत्वपूर्ण होगी।
सबसे बड़ा सवाल यही है—फाइल पांच साल तक किस मेज पर घूमती रही और जिम्मेदारी किसकी थी?
अगर न्यायपालिका को यह पूछना पड़ रहा है कि अधिकारी इतने लंबे समय तक क्या करते रहे, तो यह केवल एक मामले की देरी नहीं, बल्कि जांच तंत्र की जवाबदेही की परीक्षा है।

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