‘
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक मोहन भागवत ने लंदन में हिंदुत्व, राष्ट्र और कर्मभूमि को लेकर महत्वपूर्ण विचार रखे। उन्होंने कहा कि विदेश में रहने वाले हिंदुओं के लिए उनकी कर्मभूमि वही देश है, जहां वे रहते हैं, काम करते हैं और जिसके प्रति उनकी निष्ठा है। ब्रिटेन में रहने वाले भारतीय मूल के हिंदुओं के संदर्भ में उन्होंने स्पष्ट किया कि उनकी कर्मभूमि ब्रिटेन है और उसके प्रति निष्ठा रखना हिंदुत्व की भावना के विपरीत नहीं है।
भागवत ने हिंदुत्व को केवल पूजा-पद्धति या धार्मिक पहचान तक सीमित मानने से इनकार करते हुए इसे विविधताओं को स्वीकार करने वाली जीवन-दृष्टि के रूप में समझाया। उनका कहना था कि अलग-अलग विचार और रास्ते होने के बावजूद साथ रहना संभव है। उन्होंने जोर दिया कि एकता के लिए सबका एक जैसा होना जरूरी नहीं है।
उन्होंने कहा कि समाज को उन बातों पर ध्यान देना चाहिए जो लोगों को जोड़ती हैं, न कि उन पर जो उन्हें बांटती हैं। उनके अनुसार हिंदू विचार में विविधता स्वाभाविक है और एकता उसका आधार।
भागवत के इस बयान को विदेशों में बसे भारतीय मूल के लोगों के लिए महत्वपूर्ण संदेश माना जा रहा है—जन्मभूमि से मिले संस्कारों को संजोते हुए कर्मभूमि के प्रति पूरी निष्ठा रखना ही सच्ची जिम्मेदारी है।

Post a Comment