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उम्र बढ़ती है तो जिंदगी छोटी नहीं, समझ बड़ी होती है

संपादकीय | प्रणव बजाज


बीस की उम्र में लगता है कि दुनिया हमारी मुट्ठी में है। तीस तक पहुंचते-पहुंचते लगता है कि दुनिया हमसे आगे निकल रही है। चालीस के बाद समझ आता है कि असली दौड़ दुनिया से नहीं, खुद की बनाई हुई अपेक्षाओं से थी। उम्र का सबसे बड़ा उपहार पैसा, पद या अनुभव नहीं—चीजों को सही अनुपात में देखने की समझ है।


युवावस्था में हर फैसला अंतिम फैसला लगता है। कौन-सा करियर चुनें, कितना कमाएं, किससे संबंध रखें, समाज क्या कहेगा—हर सवाल सिर पर हथौड़े की तरह पड़ता है। दूसरों की सफलता अपनी असफलता लगती है और दूसरों की राय अपना आईना। यही वह उम्र है जब इंसान जिंदगी जीने से ज्यादा उसे साबित करने में ऊर्जा खर्च कर देता है।


लेकिन समय एक कठोर शिक्षक है। वह धीरे-धीरे बता देता है कि हर मौका पकड़ना जरूरी नहीं, हर बहस जीतना जरूरी नहीं और हर व्यक्ति को खुश करना तो बिल्कुल जरूरी नहीं। कुछ रिश्ते छूट जाते हैं, कुछ सपने अधूरे रह जाते हैं और कुछ फैसले गलत साबित होते हैं—फिर भी जिंदगी खत्म नहीं होती।


उम्र बढ़ने के साथ सवाल कम नहीं होते, उनका महत्व बदल जाता है। पहले पूछा जाता है—“लोग मेरे बारे में क्या सोचेंगे?” बाद में सवाल होता है—“मुझे सही क्या लगता है?” पहले सफलता का मतलब दूसरों से आगे निकलना था, बाद में चैन की नींद भी उपलब्धि लगने लगती है।


यही अनुभव सिखाता है कि जिंदगी लंबी हो या छोटी, उसे हर समय साबित करने की जरूरत नहीं। कुछ चीजों को पाने से ज्यादा जरूरी है यह पहचानना कि किस चीज के पीछे भागना ही नहीं है।


युवावस्था संभावनाओं से भरी होती है, उम्र समझ से। और शायद जिंदगी की सबसे बड़ी विडंबना यही है—जब हमारे पास सबसे ज्यादा समय होता है, तब समझ सबसे कम होती है; और जब समझ आती है, तब समय की कीमत सबसे ज्यादा समझ में आती है।

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