विशेष खोजी रिपोर्ट | प्रणव बजाज
इंदौर। धर्म और अनुशासन की बहस जब समाज के भीतर ही असहमति पैदा करने लगे, तब सवाल सिर्फ आस्था का नहीं रह जाता। इंदौर में जैन गरबा आयोजन निरस्त होने के बाद यही स्थिति दिखाई दे रही है। मुनि पुंगव सुधासागर जी महाराज के सार्वजनिक संदेश में जैन महिलाओं और बेटियों के सार्वजनिक रूप से गरबा करने पर आपत्ति जताए जाने के बाद आयोजन रद्द होने की बात सामने आई। दूसरी ओर, समाज के कुछ लोगों का सवाल है—अगर सार्वजनिक नृत्य जैन संस्कृति के विरुद्ध है तो यह कसौटी महिलाओं और पुरुषों के लिए अलग-अलग क्यों?
सूत्रों के अनुसार समाज के कुछ लोग इस सोच से नाराज हैं। उनका कहना है कि वे गरबा करेंगे और केवल महिलाओं को रोकना स्वीकार नहीं करेंगे। कुछ लोगों ने यह सवाल भी उठाया कि धार्मिक मर्यादा की बात हो तो उसकी व्याख्या समान रूप से सभी पर लागू होनी चाहिए।
यह बहस इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि जैन समाज में गरबा के आयोजन के उदाहरण सामने आते रहे हैं। ऐसे में क्या जैन समाज में गरबा को लेकर कोई सर्वमान्य धार्मिक नियम है या अलग-अलग संतों और संगठनों की अलग-अलग व्याख्या—यह सवाल अब खुलकर सामने है।
दूसरा सवाल आर्थिक पारदर्शिता का है। इंदौर में सुधासागर जी के चातुर्मास के दौरान मंगल कलश की बोलियों की प्रकाशित रिपोर्टों में कुल राशि ₹53 करोड़ से लेकर ₹55 करोड़ तक बताई गई। लेकिन महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि प्रकाशित रिपोर्ट के अनुसार बोली की पूरी राशि तत्काल जमा करना जरूरी नहीं था और भुगतान आगे किया जाना था। इसलिए इसे जमा चंदे की राशि मानना अभी उचित नहीं होगा।
यहीं कुछ समाजजनों द्वारा पूछे जा रहे सवाल गंभीर हैं—कुल बोली कितनी लगी, वास्तव में कितनी राशि जमा हुई, किस संस्था के खाते में गई, कितना खर्च हुआ और उसका ऑडिट सार्वजनिक होगा या नहीं?
सूत्रों के अनुसार कुछ लोगों ने आयोजकों से हिसाब सार्वजनिक करने की मांग की है। हालांकि इन दावों की स्वतंत्र पुष्टि और संबंधित आयोजन समिति का पक्ष इस रिपोर्ट में उपलब्ध नहीं है। इसलिए सवाल व्यवस्था से है, किसी व्यक्ति को दोषी ठहराने का दावा नहीं।
असल मुद्दा यही है—आस्था पर सवाल नहीं, लेकिन आस्था के नाम पर होने वाली हर बड़ी आर्थिक गतिविधि में पारदर्शिता क्यों नहीं? और धर्म की मर्यादा हो तो क्या उसकी जिम्मेदारी सिर्फ महिलाओं की होगी?
जैन समाज के भीतर उठ रहे ये सवाल किसी बाहरी विवाद से ज्यादा महत्वपूर्ण हैं, क्योंकि जवाब भी समाज को अपने भीतर से ही देना है।

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