अंतरिक्ष विभाग और इसरो अध्यक्ष को पत्र; रॉकेट-उपग्रह निर्माण में भविष्य की भूमिका और कर्मचारियों की नौकरी पर मांगी लिखित स्पष्टता
नई दिल्ली। भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) में अंतरिक्ष क्षेत्र में निजी कंपनियों की बढ़ती भागीदारी को लेकर कर्मचारियों के बीच चिंता अब खुलकर सामने आ गई है। इसरो के अलग-अलग केंद्रों से जुड़े नौ कर्मचारी संगठनों ने पहली बार सामूहिक रूप से संगठन के भविष्य को लेकर सवाल उठाए हैं। हजारों कर्मचारियों का प्रतिनिधित्व करने वाले इन संगठनों ने इसरो अध्यक्ष और अंतरिक्ष विभाग के सचिव डॉ. वी. नारायणन को पत्र भेजकर सरकार की अंतरिक्ष क्षेत्र की नई दिशा पर लिखित स्पष्टीकरण मांगा है।
कर्मचारी संगठनों की सबसे बड़ी चिंता इस बात को लेकर है कि निजी क्षेत्र को अंतरिक्ष गतिविधियों में बढ़ती भूमिका दिए जाने के बाद इसरो की मूल जिम्मेदारियां क्या रह जाएंगी। पत्र में रॉकेट और उपग्रहों के निर्माण, प्रक्षेपण सेवाओं तथा भविष्य की परियोजनाओं में इसरो की भूमिका को लेकर स्पष्ट नीति बताने की मांग की गई है। कर्मचारियों ने नौकरी की सुरक्षा और संगठन की दीर्घकालीन भूमिका को लेकर भी चिंता जताई है।
यह विवाद ऐसे समय सामने आया है जब सरकार पिछले छह वर्षों से अंतरिक्ष क्षेत्र में निजी कंपनियों की भागीदारी बढ़ाने की दिशा में काम कर रही है। सरकार का उद्देश्य निजी निवेश, नवाचार और वैश्विक अंतरिक्ष बाजार में भारत की हिस्सेदारी बढ़ाना है। इसके लिए निजी कंपनियों को अंतरिक्ष गतिविधियों में अवसर देने की व्यवस्था विकसित की गई है।
हालांकि कर्मचारी संगठनों का सवाल अलग है—क्या निजी क्षेत्र को बढ़ावा देने का अर्थ धीरे-धीरे इसरो की निर्माण और परिचालन भूमिका को कम करना है? यही वह बिंदु है जिस पर इसरो के भीतर स्पष्टता की मांग उठी है।
इसरो की आधिकारिक वेबसाइट के अनुसार डॉ. वी. नारायणन वर्तमान में अंतरिक्ष विभाग के सचिव, इसरो अध्यक्ष और अंतरिक्ष आयोग के अध्यक्ष हैं।
अब सरकार के सामने चुनौती केवल निजी क्षेत्र को बढ़ावा देने की नहीं, बल्कि देश के इस रणनीतिक संस्थान के वैज्ञानिकों और कर्मचारियों का भरोसा बनाए रखने की भी है। **इसरो का निजीकरण हो रहा है या जिम्मेदारियों का पुनर्वितरण—सरकार को यह अंतर साफ करना होगा।**

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