प्रणव बजाज : सम्पादकीय
देश की राजनीति में इन दिनों एक अजीब कमाल हो रहा है। सड़क पर छात्रों की गूंज है, इंटरनेट मीडिया पर विरोध की गूंज है और इन सबके बीच राहुल गांधी की गूंज भी लगातार बढ़ रही है। कांग्रेस को लगता है कि वह भाजपा सरकारों को घेर रही है, लेकिन राजनीतिक दृश्य का दूसरा पहलू यह है कि राहुल गांधी के कई मुद्दे भाजपा के लिए भी किसी चुनावी उपहार से कम नहीं दिखाई देते।
राहुल गांधी अब सिर्फ नेता नहीं, चलता-फिरता राजनीतिक कंटेंट बन चुके हैं। वे बोलते हैं तो खबर बनती है, पोस्ट करते हैं तो बहस शुरू होती है और किसी धार्मिक या सांस्कृतिक विषय पर टिप्पणी करते हैं तो भाजपा का प्रचार तंत्र सक्रिय हो जाता है। कांग्रेस को इससे कितने वोट मिलेंगे, यह कहना मुश्किल है, लेकिन भाजपा को अपना मुद्दा समझाने का मौका जरूर मिल जाता है।
कांग्रेस के पतन की कहानी में दो पुराने अध्याय बार-बार सामने आते हैं—घोटाले और मुस्लिम तुष्टिकरण। विडंबना यह है कि राहुल गांधी और कांग्रेस इन दोनों आरोपों की राजनीतिक छाया से अब तक पूरी तरह बाहर नहीं निकल पाए हैं।
भाजपा सरकारों में भ्रष्टाचार नहीं है, ऐसा कोई दावा नहीं कर सकता। गड़बड़ियां होंगी, सवाल भी होंगे। लेकिन कांग्रेस उन सवालों को ऐसा प्रमाणिक राजनीतिक हथियार नहीं बना पा रही, जिससे सत्ता की नींव हिले। उलटे भाजपा अक्सर कांग्रेस के पुराने दागों को सामने रखकर पलटवार कर देती है।
राहुल गांधी जब जाति का मुद्दा उठाते हैं तो भाजपा उसे तुष्टिकरण से जोड़ देती है। जब वे सामाजिक न्याय की बात करते हैं तो बहस मुद्दे से हटकर वोट बैंक तक पहुंच जाती है। और जब वे हिंदू धर्म, सनातन संस्कृति या हिंदू ग्रंथों पर टिप्पणी करते हैं तो मामला देखते-देखते कांग्रेस बनाम हिंदू और भाजपा बनाम कांग्रेस की बहस में बदल जाता है।
मनुस्मृति का मुद्दा इसका ताजा उदाहरण है। महिलाओं को पितृसत्ता के खिलाफ आवाज उठाने का अधिकार है और जिस बात में महिलाओं के अधिकारों की बात हो, उसका विरोध करना तर्कसंगत नहीं। लेकिन राजनीति में मंच भी संदेश देता है और मंच पर मौजूद चेहरे भी। राहुल गांधी जिस मंच से मनुस्मृति पर हमला करते हैं, वहीं हिजाब पहने महिला की मौजूदगी भाजपा को वह राजनीतिक तस्वीर दे देती है, जिसकी उसे जरूरत होती है।
भाजपा फिर कहती है—मनुस्मृति तो बहाना है, पीछे मैकाले, मार्क्स और मौलाना हैं। कांग्रेस कहती है—भाजपा ध्रुवीकरण कर रही है। और जनता सोचती रह जाती है कि आखिर उसके रोजगार, महंगाई, सड़क, शिक्षा और अस्पताल की बारी कब आएगी?
यानी दोनों तरफ पहलवान तैयार हैं। एक तुष्टिकरण का आरोप लगाता है, दूसरा ध्रुवीकरण का।
सबसे दिलचस्प बात यह है कि राहुल गांधी की राजनीति का असर कांग्रेस की सीमा से बाहर जाता है। उनके समर्थक उनके हर बयान को प्रतिरोध की आवाज मानते हैं, विरोधी उसे भाजपा के लिए चुनावी ईंधन मानते हैं। कई लोगों को तो यह तक लगता है कि भाजपा की लगातार मजबूत होती राजनीति में राहुल गांधी की भी अनजाने में भूमिका है।
क्योंकि भाजपा को राहुल गांधी से बड़ा राजनीतिक विरोधी चाहिए भी क्यों?
राहुल गांधी बोलते हैं—भाजपा जवाब देती है।
राहुल गांधी मुद्दा उठाते हैं—भाजपा उसे अपने पक्ष में मोड़ देती है।
राहुल गांधी मंच पर आते हैं—अगले दिन राजनीतिक बहस का केंद्र वही बन जाता है।
कांग्रेस को शायद यह लगता है कि राहुल गांधी भाजपा को घेर रहे हैं।
लेकिन भाजपा के समर्थक शायद सोचते हैं—राहुल गांधी जितना बोलेंगे, उतना हमारा प्रचार मुफ्त में होगा।
और यही भारतीय राजनीति का सबसे बड़ा व्यंग्य है—
जिस नेता की आवाज कांग्रेस को सत्ता के करीब ले जाने के लिए उठ रही है, वही आवाज कभी-कभी भाजपा को सत्ता में सुरक्षित रखने वाली दीवार भी मजबूत कर देती है।
अब सवाल राहुल गांधी का नहीं, कांग्रेस की रणनीति का है।
क्या राहुल गांधी की गूंज कांग्रेस का जनाधार बढ़ाएगी?
या फिर वही गूंज चुनाव आते-आते भाजपा के लिए सबसे मधुर राजनीतिक संगीत साबित होगी?

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