प्रणव बजाज
राहुल गांधी की राजनीति इन दिनों एक नए मोड़ पर दिखाई दे रही है। संसद से सड़क तक और युवाओं से महिलाओं तक—वह ऐसे मुद्दों को राजनीतिक बहस के केंद्र में ला रहे हैं, जिनका सीधा संबंध नई पीढ़ी और बदलते भारत से है। सवाल यह नहीं कि महिला स्वतंत्रता की बात सही है या गलत। सवाल यह है कि इस मुद्दे को राहुल गांधी किस राजनीतिक दिशा में ले जा रहे हैं?
पुणे के ‘छात्रों की गूंज’ कार्यक्रम में राहुल गांधी ने महिलाओं की स्वतंत्रता, समानता और सामाजिक दबाव पर खुलकर बात की। उन्होंने मनुस्मृति की आलोचना करते हुए महिलाओं को किसी की संपत्ति मानने वाली सोच का विरोध किया और भाजपा-आरएसएस पर महिलाओं को नियंत्रित करने वाली मानसिकता रखने का आरोप लगाया।
यहीं से राजनीतिक बहस तेज हुई।
क्योंकि महिला अधिकारों की लड़ाई निश्चित रूप से सार्वभौमिक होनी चाहिए। यदि किसी महिला पर पहनावे, शिक्षा, विवाह, सामाजिक व्यवहार या धार्मिक-सामाजिक परंपरा के नाम पर अनुचित दबाव है तो उसका विरोध होना चाहिए। लेकिन फिर सवाल यह भी स्वाभाविक है कि क्या यही कसौटी हर समुदाय, हर परंपरा और हर राजनीतिक विचारधारा पर समान रूप से लागू होगी?
राहुल गांधी का ताजा महिला-केंद्रित अभियान केवल पुणे तक सीमित नहीं है। उन्होंने महिलाओं से उनके अनुभव साझा करने की अपील की और युवाओं के बीच पहुंच बढ़ाने की रणनीति अपनाई है। कृति सेनन के पहनावे पर विवाद के बीच उनका महिलाओं की पसंद का समर्थन करना भी इसी व्यापक नैरेटिव का हिस्सा दिखाई देता है।
लेकिन राहुल गांधी के सामने सबसे बड़ा राजनीतिक प्रश्न यही है—क्या महिला अधिकार स्वयं में उनका मुद्दा है या भाजपा और संघ परिवार की वैचारिक आलोचना का एक नया माध्यम?
यह सवाल इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि उनके पुणे भाषण में महिलाओं के अधिकार की चर्चा के साथ भाजपा और आरएसएस पर सीधा हमला भी जुड़ा हुआ था। दूसरी ओर भाजपा नेताओं ने इसे हिंदू धार्मिक परंपराओं पर चयनात्मक हमला बताया है।
राहुल गांधी के समर्थक इसे नई पीढ़ी से जुड़ने की कोशिश कहेंगे। आलोचक इसे राजनीतिक पुनर्स्थापन की रणनीति बताएंगे। दोनों पक्षों के अपने तर्क हैं।
लेकिन जनता के लिए असली कसौटी भाषण नहीं, संगति है।
यदि महिला स्वतंत्रता मुद्दा है तो हर महिला की स्वतंत्रता मुद्दा होनी चाहिए। यदि पितृसत्ता का विरोध है तो हर रूप की पितृसत्ता का विरोध होना चाहिए। यदि धार्मिक रूढ़ियों पर सवाल उठाना लोकतांत्रिक अधिकार है तो वही अधिकार सभी धार्मिक-सामाजिक व्यवस्थाओं के संदर्भ में समान रूप से इस्तेमाल होना चाहिए।
राहुल गांधी ने पिछले दिनों केवल भाषण नहीं दिए, बल्कि सड़क पर उतरकर पुलिस कार्रवाई के खिलाफ धरना भी दिया और एक कथित पीड़ित के लिए प्राथमिकी दर्ज कराने का दबाव बनाया। इससे उनकी राजनीति में एक स्पष्ट बदलाव दिखता है—अब वह केवल चुनावी सभाओं के नेता नहीं, बल्कि मुद्दा-आधारित प्रतिरोध के चेहरे के रूप में अपनी छवि गढ़ने की कोशिश कर रहे हैं।
यही राहुल गांधी की वर्तमान राजनीति का सबसे महत्वपूर्ण पहलू है।
युवाओं की बेचैनी, महिलाओं की स्वतंत्रता, सामाजिक न्याय और सत्ता-विरोध—इन चारों को जोड़कर राहुल गांधी नया राजनीतिक आधार तलाश रहे हैं।
लेकिन अंतिम फैसला जनता करेगी।
क्योंकि भारत का मतदाता अब केवल यह नहीं पूछता कि कौन किसके खिलाफ बोल रहा है।
वह यह भी पूछता है—
“आप जिस सिद्धांत की बात कर रहे हैं, क्या उसे अपने राजनीतिक विरोधियों पर ही नहीं, अपने पूरे राजनीतिक व्यवहार पर भी लागू करेंगे?”
यही राहुल गांधी के नए नैरेटिव की सबसे कठिन परीक्षा है।

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