रेप जैसे गंभीर अपराधों में अदालत का एक शब्द भी पूरे न्याय तंत्र की सोच पर असर डाल सकता है। हाल के कुछ हाई कोर्ट फैसलों में यह बहस फिर तेज हुई है कि किसी यौन हमले को ‘छेड़छाड़’, ‘महिला की गरिमा भंग’ या ‘रेप के प्रयास’ की कानूनी श्रेणी में रखते समय अदालतों को किन कसौटियों का इस्तेमाल करना चाहिए।
पहला मामला—इलाहाबाद हाई कोर्ट। 2025 के एक मामले में नाबालिग की छाती दबाने और पायजामे की डोरी तोड़ने जैसी हरकतों को रेप का प्रयास नहीं, बल्कि POCSO के तहत गंभीर यौन हमला माना गया। इस टिप्पणी पर बाद में व्यापक कानूनी बहस हुई।
दूसरा—राजस्थान हाई कोर्ट। 2024 में अदालत ने नाबालिग के अंतर्वस्त्र उतारने और आरोपी के खुद निर्वस्त्र होने की घटना को भी उपलब्ध तथ्यों के आधार पर ‘attempt to rape’ नहीं माना।
तीसरा—पटना हाई कोर्ट। जुलाई 2026 में महिला की सलवार उतारने और उसके सीने को दबाने की घटना को रेप का प्रयास नहीं माना गया। सुप्रीम कोर्ट ने इस दृष्टिकोण पर सवाल उठाते हुए मामले की कानूनी व्याख्या की जांच की।
चौथा—झारखंड हाई कोर्ट। सितंबर 2026 में अदालत ने कहा कि रात में महिला के घर में घुसना, उसके कपड़े उठाना और उसे पकड़ना गंभीर आपराधिक कृत्य हो सकता है, लेकिन उपलब्ध तथ्यों में इसे रेप का प्रयास मानने के लिए जरूरी कानूनी स्तर पूरा नहीं हुआ।
पांचवां पहलू सबसे महत्वपूर्ण है—न्यायिक भाषा। ऐसे मामलों में अदालत को केवल यह नहीं देखना चाहिए कि बलात्कार की अंतिम अवस्था तक आरोपी पहुंचा या नहीं। आरोपी की मंशा, घटनाओं का क्रम, शारीरिक हमला, कपड़े उतारने की कोशिश, पीड़िता का प्रतिरोध, मेडिकल और फोरेंसिक साक्ष्य तथा पूरे घटनाक्रम को एक साथ देखना जरूरी है। सुप्रीम कोर्ट के पुराने फैसलों में भी ‘attempt’ का आकलन आरोपी की आपराधिक मंशा और उसके द्वारा उठाए गए ठोस कदमों के आधार पर करने पर जोर दिया गया है।
कानून में तकनीकी अंतर जरूरी है, लेकिन तकनीकी भाषा पीड़िता की गरिमा और घटना की गंभीरता को छोटा करने का माध्यम नहीं बननी चाहिए। न्यायाधीशों से अपेक्षा यही है कि वे कानून की सीमा स्पष्ट करें, लेकिन ऐसी भाषा और उदाहरणों से बचें जो यौन हिंसा को सामान्य या मामूली समझे जाने का संदेश दें।
Post a Comment