व्यापमं के ₹43 लाख के कथित घोटाले में मूल दस्तावेज खत्म, अब फोटोकॉपी के सहारे न्याय
भोपाल। जिस मामले में सरकारी खजाने को करीब ₹43 लाख के नुकसान का आरोप है, उसी मामले के मूल दस्तावेज 18 साल बाद रिकॉर्ड रूम से सुरक्षित नहीं निकल पाए। भोपाल की विशेष अदालत में EOW ने स्वीकार किया कि व्यापमं कंप्यूटर खरीदी मामले के मूल रिकॉर्ड दीमक से नष्ट हो चुके हैं। अब अदालत में उन्हीं दस्तावेजों की फोटोकॉपी को द्वितीयक साक्ष्य के रूप में इस्तेमाल करने की अनुमति दी गई है।
यानी जिस फाइल में 2008 की कथित गड़बड़ी का हिसाब दर्ज था, उसकी असली कागजी कहानी अब रिकॉर्ड रूम में मौजूद नहीं है। सवाल यह नहीं कि दीमक ने कागज क्यों खाए—सवाल यह है कि 18 साल तक सरकारी रिकॉर्ड की रखवाली किस व्यवस्था के भरोसे होती रही?
मामला व्यापमं द्वारा 78 कंप्यूटर और सर्वर की खरीदी से जुड़ा है। अभियोजन के अनुसार, उपकरण बाजार मूल्य से अधिक दरों पर खरीदे गए और टेंडर प्रक्रिया में नियमों की अनदेखी कर एक फर्म को लाभ पहुंचाया गया। इसी से सरकारी खजाने को करीब ₹43 लाख का नुकसान होने का आरोप है।
मामले में 16 आरोपी थे। 18 साल की लंबी कानूनी प्रक्रिया के दौरान पांच आरोपियों की मौत हो चुकी है। अब शेष आरोपियों के खिलाफ सुनवाई जारी है।
बचाव पक्ष ने मूल दस्तावेजों के नष्ट होने के बाद फोटोकॉपी को साक्ष्य मानने का विरोध किया और दस्तावेजों की प्रामाणिकता पर सवाल उठाए। अदालत ने EOW का आवेदन स्वीकार करते हुए फोटोकॉपी को द्वितीयक साक्ष्य के रूप में रिकॉर्ड पर लेने की अनुमति दी है।
अब अगली सुनवाई 14 अक्टूबर 2026 को होगी।
लेकिन इस मामले ने एक अलग सवाल जरूर खड़ा कर दिया है—भ्रष्टाचार के आरोपों की जांच में करोड़ों की फाइलें सुरक्षित रखने वाली सरकारी व्यवस्था इतनी कमजोर कैसे हुई कि 18 साल बाद सबूतों के बजाय उनकी फोटोकॉपी बची?
और सबसे बड़ा सवाल—अगर मूल रिकॉर्ड ही दीमक खा गई, तो जवाबदेही की फाइल कौन खोलेगा?

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