Top News

₹103 करोड़ की फाइल में 32 नाम... लेकिन निगरानी की कुर्सियां खाली क्यों?

20 हजार पन्नों की ईडी फाइल ने खोली कागजी विकास की पोल; फर्जी वर्क ऑर्डर, माप पुस्तिका और पूर्णता प्रमाण-पत्र से खजाना खाली—तीन गिरफ्तार, ₹59.18 करोड़ की संपत्तियों पर कार्रवाई

इंदौर। विशेष खोजी रिपोर्ट | प्रणव बजाज

कागज पर सड़क बन गई।
फाइल में काम पूरा हो गया।
माप पुस्तिका भी तैयार हो गई।
पूर्णता प्रमाण-पत्र भी मिल गया।
और फिर सरकारी खजाने से पैसा भी निकल गया।

अब सवाल यह नहीं कि बिल फर्जी था या नहीं—ईडी की जांच ने जिस पूरे तंत्र को अदालत के सामने रखा है, उसमें सवाल यह है कि इतने सारे कागज सरकारी व्यवस्था की इतनी सारी सीढ़ियां चढ़कर आखिर भुगतान की मेज तक पहुंचे कैसे?



इंदौर नगर निगम के कथित ₹103.42 करोड़ के फर्जी बिल प्रकरण में ईडी ने 24 जुलाई 2026 को विशेष पीएमएलए अदालत में 20 हजार से अधिक पन्नों की अभियोजन शिकायत 32 आरोपियों के खिलाफ दाखिल की। एजेंसी के अनुसार आरोपियों में ठेकेदार, नगर निगम के अधिकारी, लोकल फंड ऑडिट और रेजिडेंट ऑडिट से जुड़े अधिकारी तथा निजी व्यक्ति शामिल हैं।


ईडी के मुताबिक फर्जी वर्क ऑर्डर, फर्जी माप पुस्तिकाएं और नकली पूर्णता प्रमाण-पत्र के जरिए ऐसे कामों के नाम पर भुगतान कराया गया जो या तो हुए ही नहीं थे या पहले ही पूरे हो चुके थे। जांच एजेंसी के अनुसार 2018 से 2023 के दौरान इस तरीके से सरकारी धन की कथित हेराफेरी हुई।


मामले में अभय सिंह राठौर, मोहम्मद जाकिर और राहुल बड़ेरा गिरफ्तार किए जा चुके हैं। ईडी के अनुसार तलाशी और आगे की कार्रवाई में अब तक करीब ₹59.18 करोड़ की संपत्तियां जब्त, फ्रीज या अस्थायी रूप से कुर्क की गई हैं।


लेकिन इस कहानी का एक और पन्ना है—निगरानी का।


ईडी की बताई अवधि 2018 से 2023 है। इसी अवधि के बीच मनीष सिंह 28 मार्च 2020 से 9 नवंबर 2022 तक इंदौर के कलेक्टर रहे। सरकारी रिकॉर्ड इसकी पुष्टि करता है। इससे पहले वे इंदौर नगर निगम आयुक्त के रूप में भी काम कर चुके थे।


और यहीं से खोजी पत्रकारिता का सवाल शुरू होता है।


मनीष सिंह का नाम ईडी द्वारा गिरफ्तार किए गए तीन आरोपियों में नहीं है। उन्हें इस मामले का आरोपी बताने का भी कोई आधार उपलब्ध रिकॉर्ड में नहीं है।


लेकिन जब कथित फर्जी बिलों का खेल वर्षों तक चलने की बात जांच एजेंसी कह रही है, तब उस अवधि की प्रशासनिक निगरानी का सवाल पूछना क्या गलत है?


क्या किसी फाइल पर उनकी स्वीकृति थी?

क्या किसी भुगतान प्रस्ताव पर उनके हस्ताक्षर थे?

क्या किसी नोटशीट पर उनकी टिप्पणी थी?

क्या किसी जांच या आपत्ति की रिपोर्ट उनके कार्यालय तक पहुंची थी?

क्या किसी अधिकारी ने फर्जी कामों के भुगतान को लेकर चेताया था?

अगर चेताया था तो उस पर क्या कार्रवाई हुई?

और अगर नहीं चेताया था तो निगरानी व्यवस्था इतनी गहरी नींद में क्यों थी?


यही वे सवाल हैं जिनका जवाब अब दस्तावेजों से मिलना चाहिए—अनुमान से नहीं।


मामले की एक और विडंबना देखिए। जिस व्यवस्था में सरकारी काम की पहचान के लिए वर्क ऑर्डर, काम की मात्रा के लिए माप पुस्तिका और काम पूरा होने के प्रमाण के लिए कम्प्लीशन सर्टिफिकेट जैसी व्यवस्थाएं हैं, उसी व्यवस्था में ईडी ने ऐसे दस्तावेजों के इस्तेमाल का आरोप लगाया है। यानी कागज इतने मजबूत थे कि खजाना खुल गया, लेकिन जमीन पर काम ढूंढने की कोशिश इतनी कमजोर रही कि मामला जांच एजेंसी तक पहुंच गया।


तीन गिरफ्तारियां हो चुकी हैं।

32 आरोपियों के खिलाफ अभियोजन शिकायत अदालत में है।

20 हजार से ज्यादा पन्ने जांच की कहानी बता रहे हैं।

₹59.18 करोड़ की संपत्तियों पर कार्रवाई हो चुकी है।


अब सबसे दिलचस्प सवाल यही है—


अगर फर्जी काम कागज पर पैदा हुए थे, तो कागज पर उन्हें जन्म देने वालों के साथ-साथ उन्हें सरकारी मान्यता देने वाली पूरी व्यवस्था की जिम्मेदारी कौन तय करेगा?


और मनीष सिंह को लेकर सवाल भी यही है—आरोपी कौन है, यह अदालत तय करेगी; लेकिन जिस अवधि में यह कथित खेल चला, उस अवधि की प्रशासनिक फाइलें क्या कहती हैं, यह जनता जानना चाहती है।


क्योंकि भ्रष्टाचार की फाइल में सिर्फ पैसा नहीं चलता—हस्ताक्षर भी चलते हैं, नोटशीट भी चलती है, आपत्तियां भी चलती हैं और जिम्मेदारियों की कुर्सियां भी।


अब जरूरत है उन फाइलों को खोलने की।


किसने लिखा?

किसने नापा?

किसने प्रमाणित किया?

किसने पास किया?

किसने भुगतान कराया?

और किसने देखा ही नहीं?


₹103 करोड़ की कहानी का असली हिसाब इन्हीं सवालों में छिपा है।

Post a Comment

Previous Post Next Post