नई दिल्ली। चुनाव अब सिर्फ रैलियों, नारों और नेताओं की लोकप्रियता से नहीं लड़े जाते। बूथ स्तर का डेटा भी राजनीतिक रणनीति का बड़ा हथियार बन चुका है। दो चुनावों के नतीजों की तुलना के बाद भारतीय जनता पार्टी ने उन करीब 18,900 बूथों की पहचान की है, जहां दो साल के भीतर चुनावी तस्वीर बदल गई। पार्टी अब इन्हीं आंकड़ों के आधार पर कमजोर इलाकों में पकड़ मजबूत करने की रणनीति पर काम कर रही है।
डेटा की तुलना में सामने आया कि BJP को अपेक्षाकृत सबसे ज्यादा नुकसान ग्रामीण इलाकों में हुआ, जबकि शहरी क्षेत्रों में उसका प्रदर्शन तुलनात्मक रूप से कम प्रभावित हुआ। यही अंतर अब पार्टी की रणनीति का केंद्र बन गया है। ग्रामीण बूथों पर मतों में आई कमी के कारणों को अलग-अलग स्तर पर समझने की कोशिश की जा रही है।
पार्टी की कवायद सिर्फ यह पता लगाने तक सीमित नहीं है कि कौन-सा बूथ कमजोर हुआ। स्थानीय मुद्दे, पिछले चुनाव का मतदान प्रतिशत, जीत-हार का अंतर और वोटों में बदलाव जैसे आंकड़ों को मिलाकर ऐसे बूथ चिन्हित किए जा रहे हैं जहां अगले चुनाव में नुकसान की भरपाई की जा सकती है।
यानी BJP अब चुनावी तैयारी को ‘एक रणनीति सबके लिए’ के बजाय बूथ-दर-बूथ गणित में बदल रही है। ग्रामीण क्षेत्रों में संगठन को सक्रिय करना और पुराने समर्थक वोट को फिर से मजबूत करना इसका अहम हिस्सा माना जा रहा है।
अब असली सवाल यह है कि डेटा से तैयार यह रणनीति जमीन पर कितनी प्रभावी साबित होती है। क्योंकि बूथ के आंकड़े कमजोरी बता सकते हैं, लेकिन मतदाता का मन बदलने के लिए सिर्फ डेटा नहीं, स्थानीय भरोसा और राजनीतिक प्रदर्शन भी निर्णायक होगा।

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