नई दिल्ली। जिला न्यायपालिका के अधिकारियों की सेवानिवृत्ति उम्र 60 से बढ़ाकर 61 या 62 वर्ष करने का मामला सुप्रीम कोर्ट में निर्णायक मोड़ पर पहुंच गया है। अदालत ने राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों से इस मुद्दे पर दोबारा विचार करने को कहा है। 1 सितंबर 2026 की सुनवाई में सुप्रीम कोर्ट को बताया गया कि 10 राज्य/केंद्र शासित प्रदेश अभी भी उम्र बढ़ाने के विरोध में हैं।
कौन-कौन से 10 राज्य विरोध में?
सुप्रीम कोर्ट को दी गई स्थिति के मुताबिक पंजाब, हरियाणा, राजस्थान, केरल, मणिपुर, मेघालय, नागालैंड, उत्तराखंड, उत्तर प्रदेश और ओडिशा जिला जजों की सेवानिवृत्ति उम्र बढ़ाने के पक्ष में नहीं हैं। वहीं कई राज्य अभी विचार कर रहे हैं और तेलंगाना, छत्तीसगढ़, तमिलनाडु, पश्चिम बंगाल, महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश, कर्नाटक और सिक्किम समेत कुछ राज्य बढ़ोतरी के पक्ष में बताए गए हैं।
राज्यों की आपत्ति क्या है?
विरोध करने वाले राज्यों की मुख्य दलील दो आधारों पर रही है। पहला—अगर न्यायिक अधिकारियों की सेवानिवृत्ति उम्र बढ़ाई गई तो उनकी और दूसरे राज्य सरकारी कर्मचारियों की सेवानिवृत्ति उम्र में अंतर बढ़ जाएगा। दूसरा—इससे राज्य के खजाने पर अतिरिक्त वित्तीय बोझ पड़ सकता है।
लेकिन सुप्रीम कोर्ट इन तर्कों से सहमत नजर नहीं आया। अदालत ने कहा कि न्यायिक अधिकारी अलग श्रेणी हैं और उन्हें सामान्य सरकारी कर्मचारियों के साथ समान रूप से नहीं देखा जा सकता। कोर्ट ने यह भी कहा कि अनुभवी न्यायिक अधिकारियों को बनाए रखना नए अधिकारियों की भर्ती, प्रशिक्षण और पेंशन भुगतान की तुलना में जरूरी नहीं कि ज्यादा महंगा हो।
अब आगे क्या होगा?
सुप्रीम कोर्ट ने राज्यों को अपना रुख दोबारा देखने के लिए दो सप्ताह का समय दिया था और 31 अगस्त तक स्थिति रिपोर्ट मांगी थी। 1 सितंबर की सुनवाई में राज्यों के रुख सामने आने के बाद मामला आगे की सुनवाई के लिए जारी है। अंतिम फैसला सुप्रीम कोर्ट करेगा कि जिला न्यायपालिका के अधिकारियों की सेवानिवृत्ति उम्र पूरे देश में समान रूप से 61 या 62 वर्ष की जाए या नहीं।
**यानी फिलहाल सवाल सिर्फ रिटायरमेंट की उम्र का नहीं है—यह न्यायपालिका में अनुभव, नई नियुक्तियों और राज्यों की वित्तीय जिम्मेदारी के बीच संतुलन का भी बड़ा सवाल बन चुका है।**

Post a Comment