प्रणव बजाज
परिवार केवल खून के रिश्तों का नाम नहीं है। परिवार वह व्यवस्था है, जिसमें जीवन के सबसे कमजोर पड़ाव पर व्यक्ति को यह भरोसा रहता है कि उसके अपने उसके साथ खड़े होंगे। लेकिन आज यही भरोसा टूट रहा है। सोनीपत के वृद्धाश्रम में एक बुजुर्ग पिता की मृत्यु के बाद उनकी तीनों बेटियों और नाती-नातिनों का अंतिम संस्कार में शामिल न होना महज एक पारिवारिक घटना नहीं, बल्कि बदलते सामाजिक चरित्र का कठोर आईना है। बेटियों ने वीडियो कॉल पर अंतिम संस्कार देखना चुना—यह सुविधा का चरम है या संवेदनाओं का पतन?
बेशक, हर मामले के पीछे परिस्थितियां अलग हो सकती हैं। दूरी, नौकरी, स्वास्थ्य, पारिवारिक विवाद या अन्य मजबूरियां किसी संतान को अंतिम समय में पहुंचने से रोक सकती हैं। इसलिए किसी एक घटना के आधार पर पूरी पीढ़ी को कठघरे में खड़ा करना उचित नहीं होगा। लेकिन सवाल यह है कि ऐसी घटनाएं हमें बेचैन क्यों नहीं करतीं?
आज समय की कीमत रिश्तों से अधिक आय में नापी जा रही है। संयुक्त परिवार टूटे, शहर बढ़े, नौकरियां बदलीं और जीवन की गति तेज हुई। माता-पिता धीरे-धीरे घर के सदस्य से जिम्मेदारी में बदल दिए गए। शुरुआत होती है—‘समय नहीं मिलता’ से और अंत होता है—‘वृद्धाश्रम ही बेहतर है’ पर।
सबसे खतरनाक बात यह है कि हमने इस अकेलेपन को सामान्य मानना शुरू कर दिया है। जिन माता-पिता ने बच्चों को खड़ा करने में अपना जीवन लगा दिया, उन्हीं के जीवन की संध्या में समाज के पास उनके लिए संस्थागत इंतजाम तो हैं, लेकिन अपनापन घटता जा रहा है।
यह समस्या केवल बेटियों या बेटों की नहीं है। यह पूरी व्यवस्था की समस्या है। बाजार ने स्त्री और पुरुष दोनों से उत्पादक बनने की अपेक्षा की, लेकिन परिवार ने भावनात्मक श्रम का मूल्य तय नहीं किया। नतीजा सामने है—कमाई बढ़ी, सुविधा बढ़ी, लेकिन साथ घटता गया।
सरकार को वरिष्ठ नागरिकों के लिए स्वास्थ्य सेवा, डे-केयर और सामुदायिक केंद्रों के साथ ऐसी रोजगार नीतियां बनानी चाहिए, जिनमें माता-पिता की देखभाल को भी सामाजिक जिम्मेदारी माना जाए। कंपनियों को अभिभावक देखभाल अवकाश जैसी सुविधाओं के लिए प्रोत्साहन मिलना चाहिए। लेकिन कानून रिश्ते पैदा नहीं कर सकता।
रिश्ते घर में ही बचेंगे।
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का ‘कुटुंब प्रबोधन’ जैसे अभियानों के माध्यम से परिवार-केंद्रित चेतना पर जोर देना इसी व्यापक चुनौती की ओर संकेत करता है। ऐसे प्रयास तभी सार्थक होंगे, जब परिवार स्वयं यह तय करे कि बुजुर्ग बोझ नहीं, उसकी स्मृति, अनुभव और जड़ों का हिस्सा हैं।
आज सवाल तीन बेटियों का नहीं है। सवाल यह है कि कल जब हम बूढ़े होंगे, तब हमारी संतान हमारे पास होगी या सिर्फ वीडियो कॉल?
यदि इस प्रश्न का उत्तर हमें डराता है, तो परिवार बचाने की शुरुआत आज से करनी होगी। क्योंकि जिस समाज में माता-पिता की अंतिम यात्रा भी ‘सेवा’ के हवाले हो जाए, वहां विकास के आंकड़े बहुत कुछ बता सकते हैं—लेकिन समाज कितना मानवीय बचा है, यह नहीं।

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