रमेश उम्र 30 वर्ष!एक नौकरी पेशा इंसान!उसके पिताजी बचपन मे ही गुजर गए थे! बेचारी माँ (मीरा बाई) ने ही उसे पढ़ा लिखाकर काबिल बनाया! उस विधवा औरत (मीरा ) ने रमेश की खातिर जीवन मे बहुत संघर्ष किया था! ज़ब बुढ़ापे मे सुकून मिलने लगा तो उसका जीवन सरला (बहू ) ने दुभर कर दिया! उम्र पचपन वर्ष पार कर चुकी थी, चेहरे पर झुर्रियां दिखने लगी थी खून जमने लगा था! रमेश ही बेचारी का सहारा था, लेकिन उसकी बहू सरला को मीरा फूटी आँख नहीं सुहाती थी!
रमेश कहने लगा:-"अब क्या हुआ? क्या कह दिया माँ ने जो बखेड़ा कर रही हो?"
सरला गुस्सा करने लगी:-"हाँ! हाँ! मैं ही बखेड़ा करती हूँ आपकी माँ तो कुछ नहीं करती? अब मैं इस घर मे नहीं रह सकती सुन लिया! आप हम दोनों मे से किसी को चुन लो!
रमेश :-"मैं कोई भाजी मार्केट मे नहीं हूँ जो तुम दोनों मे से किसी को चुन लू!
सरला :-"फिर मुझे ही मायके छोड़ दो! मैं नहीं रह सकती"
मीरा दोनों की बांते सुन रही थी! आँखों से आँशु की बुँदे लुढ़कने लगी:-"बहू मुझे इस बुढ़ापे मे तुमसे केवल 2 वक़्त की रोटी चाहिए! इसके अलावा कुछ नहीं मांगूंगी! क्यों मुझे मेरे बेटे से अलग करती हो? बखेड़ा करती हो? मेरे बुढ़ापे का सहारा मेरा बेटा है, मेरे बुढ़ापे की लाठी क्यों छीन रही हो?
ज़ब रमेश छोटा था मैंने उसे दिनरात मेहनत करके पढ़ाया लिखाया! और अब तुम कहती हो मेरे बच्चे को छोड़ दूँ? "
सरला :-" हाँ छोड़ना पड़ेगा नहीं तो मैं इस घर मे नहीं रहूंगी!अब आप देख लो! बेटा का परिवार बनाना है या नहीं!आपका जीवन तो बीत चूका अब हमें जीने दो "
रमेश कुछ नहीं बोल सका बोलता तो बात का बतंगढ़ और बनता!
सरला :-"वृद्धाश्रम मे आप आराम से रह सकती हो! वहा कोई तकलीफ नहीं होंगी और आप अकेली थोड़ी न रहोगी वहा और भी वृद्ध होंगे "
सरला की बाते सुनकर दोनों स्तब्ध कुछ नहीं बोले क्योकि सरला से जितना मुश्किल था!
मीरा भी बेटे का परिवार इस बुढ़ापे मे उजाड़ना नहीं चाहती थी
उसने दिल पर पत्थर रख लिया आँखों पर लेंस वाला ऐनक लगाकर कहने लगी "रमेश बेटा कल सुबह मुझे वृद्धाश्रम छोड़ आना! समझूंगी तुम्हारा मेरा साथ यही तक था "
रमेश चाहता तो सरला की बातों का जवाब देता लेकिन उस भुत से ज्यादा आपने भविष्य की चिंता थी परिवार उजड़ने का डर, इसलिए स्तब्ध रहा!
दूसरे दिन रमेश मीरा को शहर के वृद्धाश्रम छोड़ने गया!
घर लौटते समय बस मे उसके नजदीक पैतिस वर्ष का आदमी आया :-"भाई साहब आपको ऐतराज़ न हो तो आपके नजदीक बैठ सकता हूँ? "
रमेश ने उस अजनबी की ओर देखा कंधे पर बेग दाये हाथ मे छड़ी!
रमेश :-" जी! जरूर बैठ जाइये "
अजनबी रमेश के नजदीक बैठ गया!
बस थोड़ी आगे बढ़ी!
वह अजनबी बहुत ख़ुश था! वह खिड़की के बाहर का नजारा देखता रहा! रमेश को अजनबी के हाथ मे छड़ी देखकर अजीब लगा! सोचने लगा यह छड़ी तो केवल आंधे लोग रखते है इसको इस छड़ी की क्या जरूर? फिर भी पूछता हूँ "
रमेश अजनबी से कहने लगा :-" भैय्या आप कहा जा रहे हो?"
अजनबी:-"भाई साहब आगे पास मे ही मेरा गांव है!
शहर मे डॉक्टर को दिखाने आया था " भाई साहब आप कहा जा रहे हो और शहर कुछ काम से आये थे क्या?? "
रमेश:-"हाँ मैं भी मेरे गांव ही जा रहा जो यहां से तीस किलोमीटर दूर है "
अजनबी ने दोबारा पूछा-"शहर कुछ काम से आये थे क्या? "
अजनबी की इस बात का रमेश के पास कोई जवाब नहीं था वह स्तब्ध रहा!
कुछ क्षण बाद रमेश पूछने लगा :-"भैय्या आपके पैरो मे कोई तकलीफ हैं क्या?? "
अजनबी:-"नहीं तो मेरे पैर तो ठीक हैं "
रमेश:-"तो फिर यह छड़ी किसलिए? यह तो आंधे लोग रखते हैं ताकि इसके सहारे चल सके"
अजनबी:-"आप ने ठीक कहा भाई साहब ये छड़ी आंधे लोग ही रखते हैं "
रमेश:-"लेकिन आपने क्यों रखी हैं? "
अजनबी:-"भाई साहब अगर किसी आंधे को अचानक दिखने लगता हैं तो सबसे पहले वह उस छड़ी को फेकता हैं जिसके सहारे अभी तक चला था लेकिन मैं उन लोगो मे से नहीं हूँ जो काम निकल जाने पर सहारा देने वाले को छोड़ दे!"
रमेश"-"मैं समझा नहीं? "
अजनबी:-"भाई साहब बचपन मे मेरी आँखों की रौशनी चली गयी थी मैं आँधा था लेकिन डॉक्टर और उपरवाले की महेरबानी से अभी आठ दिन पहले ही ठीक हुआ हुआ हूँ तो भला उस सहारे को कैसे छोड़ दूँ जिसने मेरा साथ दिया मुझे राह दिखाई ""और आज के जमाने मे छड़ी तो बहुत दूर की बात लोग उन माँ बाप को छोड़ देते जो उन्हें बचपन मे पालते पोसते हैं ज़ब वह दुनिया को समझने लगते हैं उस समय उस बात को भूल जाते या जानबूझ कर अनदेखा करते हैं जिन्हे हमें दुनिया दिखाई अन्धकार से प्रकाश दिखाया उस सहारे को कैसे छोड़ दे?
रमेश उसकी बातों को सुनता रहा क्यों की उसकी बांते मे ही रमेश का आतीत छीपा था!
अजनबी का गांव आते ही वह बस से निचे उतर गया! रमेश उस अजनबी की छड़ी को देखते ही रह गया !!
©लोकेन्द्र विश्वकर्मा
