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चीन के निवेश पर भारत की कड़ी स्क्रूटनी, एक साल में सिर्फ एक चीनी एफडीआई प्रस्ताव को मिली मंजूरी

 

भारत सरकार ने वित्त वर्ष 2025-26 में चीन से आए प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (एफडीआई) के केवल एक प्रस्ताव को मंजूरी दी, जिसकी राशि लगभग 1 करोड़ रुपये थी। वहीं, हांगकांग से आए 13 निवेश प्रस्तावों को स्वीकृति मिली। ये आंकड़े बताते हैं कि भारत अब भी चीन और अन्य पड़ोसी देशों से आने वाले निवेश पर सख्त जांच की नीति अपनाए हुए है।



क्या है मामला?


अप्रैल 2020 में केंद्र सरकार ने 'प्रेस नोट-3' लागू किया था। इसके तहत भारत से जमीनी सीमा साझा करने वाले देशों—जैसे चीन, पाकिस्तान, बांग्लादेश, नेपाल, भूटान, म्यांमार और अफगानिस्तान—से आने वाले किसी भी निवेश के लिए सरकार की पूर्व अनुमति अनिवार्य कर दी गई। इसका उद्देश्य संवेदनशील क्षेत्रों में अवसरवादी अधिग्रहण और राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े जोखिमों को रोकना है।


चीन पर सबसे कड़ी निगरानी


उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, चीन से आए अधिकांश निवेश प्रस्ताव अभी भी विस्तृत जांच प्रक्रिया से गुजरते हैं। सरकार निवेश के स्रोत, निवेशक की पृष्ठभूमि, हिस्सेदारी और राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े पहलुओं की गहन समीक्षा के बाद ही मंजूरी देती है।


हांगकांग के प्रस्तावों को मिली मंजूरी


वित्त वर्ष 2025-26 में हांगकांग से आए 13 एफडीआई प्रस्तावों को मंजूरी दी गई। हालांकि, इन निवेशों की भी 'प्रेस नोट-3' के तहत जांच की गई और आवश्यक अनुमति के बाद ही उन्हें स्वीकृति मिली।


क्यों अहम है यह फैसला?

राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े जोखिमों पर नियंत्रण।


संवेदनशील क्षेत्रों में विदेशी निवेश की कड़ी निगरानी।


पड़ोसी देशों से आने वाले निवेश में पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित करना।


घरेलू उद्योगों और रणनीतिक क्षेत्रों की सुरक्षा को प्राथमिकता देना।

विशेषज्ञों की राय

विशेषज्ञों का मानना है कि भारत विदेशी निवेश का स्वागत करता है, लेकिन राष्ट्रीय सुरक्षा और रणनीतिक हितों से जुड़े मामलों में सरकार सतर्क रुख अपनाए हुए है। यही कारण है कि चीन से आने वाले निवेश प्रस्तावों की जांच अन्य देशों की तुलना में अधिक गहनता से की जाती है।

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