जुलाई में 20 फीसदी से ज्यादा की तेज बढ़त के बाद अगस्त की शुरुआत वैश्विक बाजारों के लिए राहत भरी रही। पश्चिम एशिया में तनाव कम होने की उम्मीद के बीच कच्चे तेल की कीमतों में बड़ी गिरावट दर्ज की गई। रिपोर्टों के मुताबिक, ईरान पर संभावित अमेरिकी सैन्य कार्रवाई फिलहाल टलने से निवेशकों की चिंता घटी और तेल बाजार में बिकवाली बढ़ गई।
कच्चे तेल के दाम में नरमी
खाड़ी क्षेत्र का कच्चा तेल करीब 83 डॉलर प्रति बैरल पर कारोबार करता दिखा।
अमेरिकी डब्ल्यूटीआई क्रूड की कीमत करीब 80 डॉलर प्रति बैरल पर पहुंच गई।
जुलाई में भू-राजनीतिक तनाव के कारण तेल में 20 फीसदी से अधिक की तेजी देखने को मिली थी।
गिरावट की बड़ी वजह
पश्चिम एशिया में युद्ध की आशंका कम होना।
ईरान पर संभावित अमेरिकी कार्रवाई टलने की खबरों से बाजार में राहत।
तेल आपूर्ति बाधित होने की चिंता कम होना।
निवेशकों का जोखिम लेने का भरोसा बढ़ना।
भारत पर क्या होगा असर?
भारत अपनी जरूरत का लगभग 85 फीसदी कच्चा तेल आयात करता है। ऐसे में अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल सस्ता होने से देश को कई मोर्चों पर राहत मिल सकती है।
पेट्रोल और डीजल की लागत पर दबाव कम हो सकता है।
महंगाई नियंत्रित रखने में मदद मिल सकती है।
आयात बिल घटने से अर्थव्यवस्था को राहत मिल सकती है।
परिवहन और उद्योगों की लागत में कमी आने की संभावना है।
आगे क्या?
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि पश्चिम एशिया में तनाव दोबारा नहीं बढ़ता और तेल उत्पादक देशों की आपूर्ति सामान्य बनी रहती है, तो कच्चे तेल की कीमतों में फिलहाल स्थिरता बनी रह सकती है। हालांकि, किसी भी बड़े भू-राजनीतिक घटनाक्रम से बाजार में फिर तेज उतार-चढ़ाव देखने को मिल सकता है।

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