सरकार का मुंह बंद, नेता खामोश, नौकरशाह बेपरवाह!
इंदौर/बौद्धिक प्रतिकार। इंदौर में बारिश कम हुई, लेकिन सड़कों पर गड्ढों की बारिश जरूर हो गई। शहर के कई इलाकों में सड़कें इस कदर टूट चुकी हैं कि आधा किलोमीटर का रास्ता भी वाहन चालकों के लिए किसी परीक्षा से कम नहीं। सड़क पर डामर कम और गड्ढे ज्यादा दिखाई दे रहे हैं।
नगर निगम बारिश के दौरान नई तकनीक से पेचवर्क कर गड्ढे भरने का दावा कर रहा है, लेकिन हालात बता रहे हैं कि मरम्मत के बावजूद सड़कें गड्ढामुक्त नहीं हो पा रही हैं। हालात इतने गंभीर हैं कि सोमवार को गड्ढे की वजह से एक बाइक सवार की जान भी चली गई।
सबसे बड़ा सवाल यह है कि सरकार का मुंह बंद क्यों है? नेता खामोश क्यों हैं और नौकरशाह कार्रवाई से क्यों बच रहे हैं? जनता रोज इन टूटी सड़कों से गुजर रही है, वाहन खराब हो रहे हैं और हादसों का खतरा बना हुआ है, लेकिन जिम्मेदारों की तरफ से सिर्फ मरम्मत के दावे सुनाई देते हैं।
हर साल सड़कों के निर्माण और मरम्मत पर करोड़ों रुपये खर्च किए जाते हैं। फिर सवाल उठता है कि आखिर ये सड़कें इतनी जल्दी क्यों टूट जाती हैं? क्या निर्माण की गुणवत्ता की जांच सिर्फ कागजों पर होती है? क्या ठेकेदारों की जवाबदेही तय होती है? और यदि सड़क बनाने के कुछ समय बाद ही गड्ढे निकल आएं तो इसकी जिम्मेदारी किसकी है?
इंदौर को स्वच्छता में नंबर वन बताने वाले जिम्मेदारों को अब सड़कों की तस्वीर भी देखनी चाहिए। शहर की चमकती तस्वीरों के पीछे गड्ढों से भरी सड़कें छिपाई नहीं जा सकतीं।
जनता पूछ रही है—गड्ढे कौन भरेगा और जवाबदेही किसकी तय होगी?
सिर्फ गड्ढे भरने से काम नहीं चलेगा। अब उन फाइलों और फैसलों की भी जांच होनी चाहिए, जिनके बाद सड़कें बार-बार टूटती हैं।
बौद्धिक प्रतिकार का सवाल सीधा है—सड़क जनता के लिए बनी है या ठेकेदार के बिल के लिए?

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