प्रणव बजाज
घर में पति ने एक दिन खाना बना दिया, बच्चों को स्कूल छोड़ दिया या बाजार से सब्जी ले आया—और इसे ‘मदद’ कहा गया। सवाल यह है कि जिस घर की जिम्मेदारी दोनों की है, उसमें एक व्यक्ति दूसरे की मदद क्यों कर रहा है? यही भाषा उस अदृश्य असमानता को बचाए रखती है, जिसे अब शोधकर्ता ‘मेंटल लोड’ या मानसिक घरेलू श्रम कह रहे हैं।
मेंटल लोड सिर्फ झाड़ू-पोंछा, खाना और कपड़े नहीं है। असली बोझ है—यह याद रखना कि गैस कब खत्म होगी, बच्चे की फीस कब भरनी है, किसे डॉक्टर के पास ले जाना है, राशन में क्या कम है, स्कूल की बैठक कब है और घर में अगले सप्ताह क्या चाहिए। यानी काम करने से पहले काम के बारे में लगातार सोचना।
शोध अब इस समस्या को महज घरेलू झगड़ा नहीं मानता। 2025 में प्रकाशित एक अध्ययन में पाया गया कि माताएं घरेलू काम के मुकाबले संज्ञानात्मक यानी योजना और प्रबंधन वाले श्रम का अधिक असमान हिस्सा उठाती हैं। यह बोझ महिलाओं में तनाव, थकान, मानसिक स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं और रिश्ते के कामकाज से जुड़ा पाया गया।
एक अन्य शोध समीक्षा में भी सामने आया कि बच्चों और पालन-पोषण से जुड़े मानसिक निर्णयों में महिलाओं की जिम्मेदारी पुरुषों की तुलना में अधिक रहती है। वहीं हालिया शोध बताता है कि जब घरेलू श्रम का बंटवारा असमान होता है, तो महिलाओं की रिश्ते से संतुष्टि भी कम हो सकती है।
भारत में तस्वीर और भी गंभीर है। 2019 के समय-उपयोग सर्वेक्षण पर आधारित शोध में पाया गया कि महिलाओं का बिना वेतन वाला घरेलू और देखभाल संबंधी काम पुरुषों से काफी अधिक है और इसके पीछे सामाजिक लैंगिक मान्यताओं की बड़ी भूमिका है।
अब असली सवाल पतियों से है—क्या आप घर का काम करते हैं या उसकी जिम्मेदारी भी उठाते हैं?
क्योंकि ‘बताओ क्या करना है’ जिम्मेदारी नहीं है।
‘कपड़े धो दूं?’ जिम्मेदारी नहीं है।
‘राशन की सूची बना दो, मैं ले आऊंगा’ भी पूरी जिम्मेदारी नहीं है।
पूरी जिम्मेदारी तब है, जब व्यक्ति खुद देखे कि क्या करना है, कब करना है, कैसे करना है और काम पूरा होने तक उसका पीछा भी करे।
और यह सिर्फ महिलाओं का मुद्दा नहीं, रिश्ते की गुणवत्ता का मुद्दा है। शोध में संज्ञानात्मक घरेलू श्रम का संबंध रिश्ते के कामकाज से भी पाया गया है।
इसलिए आधुनिक परिवार की असली परीक्षा यह नहीं कि पति-पत्नी घर का काम कितना बांटते हैं। परीक्षा यह है कि घर चलाने का दिमागी बोझ किसके सिर पर है।
जब तक ‘घर संभालना’ महिला की स्वाभाविक ड्यूटी और पुरुष की ‘मदद’ माना जाता रहेगा, बराबरी सिर्फ भाषणों में रहेगी। रिश्ते में बराबरी चाहिए तो झाड़ू बराबर बांटने से पहले जिम्मेदारी बराबर बांटनी होगी।

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