प्रणव बजाज
मध्य प्रदेश में सरकारी भुगतान व्यवस्था की सुरक्षा पर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। जांच में सामने आए अलग-अलग मामलों ने यह दिखाया है कि यदि सरकारी वित्तीय प्रणाली में कर्मचारी कोड, लॉगिन, मोबाइल नंबर और बैंक खाते के मिलान जैसी बुनियादी व्यवस्थाएं कमजोर हों, तो सरकारी पैसा निजी खातों तक पहुंचने में देर नहीं लगती।
मामला केवल किसी एक अधिकारी की कथित करतूत तक सीमित नहीं है। अलीराजपुर के कट्ठीवाड़ा में सामने आया ₹20.47 करोड़ का मामला इसका गंभीर उदाहरण है। प्रवर्तन निदेशालय की जांच के अनुसार 2018 से 2023 के बीच फर्जी बिलों के माध्यम से सरकारी राशि निकाली गई और रकम आरोपी तथा परिवार के सदस्यों से जुड़े बैंक खातों के जरिए घुमाई गई। बाद में इस धन से धार जिले के गंधवानी क्षेत्र में जमीन खरीदी गई। ईडी ने इसी मामले में ‘श्री बालाजी धाम’ के 56 आवासीय भूखंडों को अस्थायी रूप से जब्त किया है, जिनकी कीमत ₹6 करोड़ से अधिक बताई गई है।
यहां सबसे बड़ा सवाल रकम का नहीं, व्यवस्था का है।
अगर किसी सरकारी कर्मचारी के नाम पर गलत भुगतान हो रहा है, पैसा दूसरे खातों में जा रहा है और फिर उसी रकम से संपत्तियां खरीदी जा रही हैं, तो सवाल केवल आरोपी पर नहीं होना चाहिए। सवाल उन अधिकारियों और नियंत्रण प्रणालियों पर भी होना चाहिए, जिन्हें समय रहते असामान्य लेन-देन पकड़ना था।
अलीराजपुर मामले में ईडी की कार्रवाई यह भी बताती है कि कथित गबन की रकम को परिवार से जुड़े खातों के माध्यम से घुमाने और फिर संपत्ति में लगाने की जांच हुई है। जनवरी 2026 में ईडी ने कमल राठौर समेत छह आरोपियों के खिलाफ विशेष पीएमएलए अदालत में अभियोजन शिकायत दाखिल की थी।
यही वह बिंदु है जहां सरकार से जवाब मांगना जरूरी हो जाता है।
सरकारी खजाना किसी अफसर की निजी तिजोरी नहीं है। यह जनता के कर से बना पैसा है। एक-एक रुपया स्कूल, अस्पताल, सड़क, पेंशन, छात्रवृत्ति और सरकारी योजनाओं के लिए होता है। अगर भुगतान प्रणाली में सेंध लगाकर यही पैसा निजी खातों और संपत्तियों तक पहुंचता है, तो यह केवल वित्तीय अपराध नहीं—सरकारी भरोसे पर हमला है।
अब सरकार को केवल एफआईआर और गिरफ्तारी की संख्या बताने से आगे जाना होगा।
कितने मामलों में पैसा निजी खातों में गया?
कितनी राशि वास्तव में वापस आई?
कितने अधिकारियों की विभागीय जिम्मेदारी तय हुई?
कितने मामलों में संपत्ति जब्त हुई?
और सबसे महत्वपूर्ण—जिस सिस्टम से भुगतान हुआ, उसमें पांच-पांच साल तक असामान्य लेन-देन पकड़ में क्यों नहीं आया?
अलीराजपुर का मामला सामने आने के बाद यह सवाल और बड़ा हो जाता है कि क्या वित्तीय निगरानी व्यवस्था में केवल तकनीकी सुधार पर्याप्त हैं, या जिम्मेदारी तय करने की भी जरूरत है।
सरकार यदि भ्रष्टाचार पर शून्य सहनशीलता का दावा करती है तो उसे सिर्फ पैसा वापस लाने की कोशिश नहीं करनी चाहिए। उसे यह भी बताना चाहिए कि जनता के पैसे की रखवाली करने वाले तंत्र में सेंध लगी कैसे और इतने लंबे समय तक दिखाई क्यों नहीं दी।
क्योंकि सरकारी खजाने से पैसा निकलना जितना गंभीर है, उससे कहीं ज्यादा गंभीर है—उसके निकलने का रास्ता सिस्टम के भीतर से बन जाना।

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