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महाराष्ट्र को ‘मुंढे मॉडल’ चाहिए या सिर्फ एक चेहरा?

 सत्ता के लिए यह पत्र नहीं, व्यवस्था के खिलाफ आरोप-पत्र है



संपादकीय: प्रणव बजाज

किसी आईएएस अधिकारी को मुख्यमंत्री बनाने की मांग अपने आप में असाधारण हो सकती है, लेकिन तुकाराम मुंढे के नाम ने महाराष्ट्र की राजनीति में जो हलचल पैदा की है, उसे महज एक संगठन का पत्र कहकर खारिज करना आसान नहीं होगा। दक्षिण मुंबई के ‘आम्ही गिरगावकर’ संगठन ने केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह को पत्र लिखकर मुंढे को महाराष्ट्र का मुख्यमंत्री बनाने की मांग की है। संगठन ने मराठी हितों, मुंबई की जमीन, आवास और स्थानीय लोगों से जुड़े मुद्दों पर कठोर कार्रवाई की मांग करते हुए आंदोलन की चेतावनी भी दी है। 


लेकिन यहां असली सवाल ‘मुंढे मुख्यमंत्री बनेंगे या नहीं’ का नहीं है। असली सवाल यह है कि आखिर जनता को एक नौकरशाह में वह कठोरता क्यों दिखाई देने लगी, जो उसे राजनीतिक नेतृत्व में दिखाई नहीं दे रही?


तुकाराम मुंढे के प्रति आकर्षण का सबसे बड़ा कारण उनकी कड़क प्रशासनिक छवि है। अन्न एवं औषधि प्रशासन के आयुक्त के रूप में उन्होंने मिलावट, खाद्य सुरक्षा और नियमों के उल्लंघन के मामलों में कार्रवाई की है। उनकी इसी कार्यशैली को लेकर संगठन उन्हें बिना राजनीतिक दबाव निर्णय लेने वाला अधिकारी बता रहा है। 


यहीं से लोकतंत्र के लिए एक असहज सवाल पैदा होता है—क्या जनता अब नेताओं से ज्यादा अधिकारियों पर भरोसा करने लगी है?


अगर जवाब हां है तो यह किसी एक सरकार की विफलता नहीं, पूरी राजनीतिक व्यवस्था के लिए खतरे की घंटी है।


मुख्यमंत्री कोई ‘सख्त अफसर’ भर नहीं होता


मुंढे की ईमानदार और कठोर प्रशासनिक छवि की प्रशंसा अपनी जगह उचित हो सकती है, लेकिन मुख्यमंत्री का पद केवल अधिकारियों पर कार्रवाई करने का पद नहीं है। मुख्यमंत्री को विधानसभा, राजनीतिक दलों, सामाजिक समूहों, क्षेत्रीय असमानताओं, अर्थव्यवस्था, किसानों, उद्योग, रोजगार, कानून-व्यवस्था और केंद्र-राज्य संबंधों के बीच संतुलन बनाना पड़ता है।


इसलिए किसी अधिकारी की लोकप्रियता को सीधे मुख्यमंत्री पद की योग्यता मान लेना भी जल्दबाजी होगी।


लेकिन दूसरी तरफ राजनीतिक दलों को यह सवाल जरूर पूछना चाहिए कि मुंढे के नाम की मांग पैदा ही क्यों हुई?


मराठी अस्मिता बनाम प्रशासनिक शासन


संगठन के पत्र में मराठी भाषियों के साथ कथित अन्याय, नए भवनों में मराठी परिवारों के लिए आवास, सार्वजनिक जमीनों और आरक्षित मैदानों की सुरक्षा जैसे मुद्दे उठाए गए हैं। साथ ही संगठन ने चेतावनी दी है कि मांगों की अनदेखी हुई तो आंदोलन और उग्र हो सकता है। 


यहीं सावधानी की सबसे ज्यादा जरूरत है।


मराठी अस्मिता के नाम पर किसी भी दूसरे भारतीय नागरिक को निशाना बनाना स्वीकार्य नहीं हो सकता। मुंबई महाराष्ट्र की राजधानी है, लेकिन वह भारत के संविधान के भीतर रहने वाला महानगर भी है। स्थानीय लोगों के अधिकारों की रक्षा और दूसरे राज्यों से आए नागरिकों के संवैधानिक अधिकार—दोनों के बीच संतुलन सरकार की जिम्मेदारी है।


सरकार यदि इस असंतोष को केवल ‘क्षेत्रीय राजनीति’ कहकर टाल देती है तो वह मूल समस्या से भागेगी। और यदि इसका जवाब केवल भावनात्मक भाषणों से दिया जाता है तो स्थिति और बिगड़ेगी।


आंदोलन की भाषा नहीं, जवाबदेही की जरूरत


‘संयुक्त महाराष्ट्र आंदोलन से भी उग्र आंदोलन’ की चेतावनी लोकतंत्र में दबाव बनाने का रास्ता नहीं हो सकती। आंदोलन अधिकार है, लेकिन हिंसा या कानून हाथ में लेना किसी भी हालत में स्वीकार्य नहीं होना चाहिए। उपलब्ध रिपोर्टों में संगठन ने 30 अगस्त को मुंबई के हुतात्मा चौक पर आंदोलन की तैयारी की बात कही है। 


सरकार को भी अब केवल बयान देने के बजाय तीन काम करने चाहिए—


पहला, मुंबई की सार्वजनिक जमीन, आरक्षित भूखंड और आवासीय परियोजनाओं का पूरा ब्योरा सार्वजनिक किया जाए।


दूसरा, मराठी लोगों के साथ भेदभाव के जिन आरोपों का पत्र में उल्लेख है, उनकी तथ्यात्मक जांच कराई जाए।


तीसरा, यह स्पष्ट किया जाए कि जिन सरकारी नीतियों को लेकर असंतोष है, उनमें वास्तव में कितना लाभ स्थानीय नागरिकों तक पहुंच रहा है।


और अमित शाह के सामने सबसे बड़ा सवाल


अमित शाह को लिखा गया पत्र राजनीतिक रूप से कितना असर डालता है, यह अलग विषय है। लेकिन केंद्र सरकार के सामने इससे एक बड़ा संदेश जरूर गया है—महाराष्ट्र में एक वर्ग राजनीतिक नेतृत्व से अधिक कठोर, निष्पक्ष और जवाबदेह प्रशासन चाहता है।


इस मांग को केवल ‘मुंढे बनाम वर्तमान मुख्यमंत्री’ की राजनीति में बदल देना आसान होगा, लेकिन उससे असली प्रश्न दब जाएगा।


महाराष्ट्र को किसी एक व्यक्ति की पूजा नहीं, ऐसी व्यवस्था चाहिए जिसमें ईमानदार अधिकारी को राजनीतिक संरक्षण की जरूरत न पड़े, भ्रष्ट पर कार्रवाई करने के लिए किसी ‘मुंढे’ के आने का इंतजार न करना पड़े और आम नागरिक को अपना काम कराने के लिए किसी प्रभावशाली व्यक्ति का दरवाजा न खटखटाना पड़े।


मुंढे मुख्यमंत्री बनें या नहीं—यह फैसला संविधान, राजनीति और लोकतांत्रिक प्रक्रिया करेगी। लेकिन मुंढे को मुख्यमंत्री बनाने की उठी मांग को पैदा करने वाली बेचैनी को नजरअंदाज करना महाराष्ट्र की राजनीति की सबसे बड़ी भूल होगी।


क्योंकि जब जनता किसी अधिकारी में नेतृत्व तलाशने लगे, तो सवाल अधिकारी से पहले **राजनीतिक नेतृत्व से पूछा जाना चाहिए—आखिर जनता आपसे नाराज क्यों है?**

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