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चमकती जीडीपी, बुझते सपने — क्या भारत दो हिस्सों में बंट रहा है?

 

प्रणव बजाज

देश में हर तरफ विकास के दावे हैं। अर्थव्यवस्था दुनिया की सबसे तेज़ रफ्तार से बढ़ रही है। शेयर बाजार नए रिकॉर्ड बना रहा है। अरबपतियों की संपत्ति हर साल बढ़ रही है। सरकारें उपलब्धियों का ढोल पीट रही हैं। लेकिन एक सवाल है, जिसका जवाब कोई नहीं देना चाहता—अगर सब कुछ इतना अच्छा है, तो पढ़ा-लिखा युवा नौकरी के लिए दर-दर क्यों भटक रहा है?



आज भारत की सबसे बड़ी त्रासदी बेरोजगारी नहीं, बल्कि असमानता है। देश की संपत्ति, मुनाफा और अवसर लगातार कुछ हाथों में सिमटते जा रहे हैं। दूसरी तरफ करोड़ों लोग सरकारी राशन, पेंशन, अनुदान और मुफ्त योजनाओं के सहारे जीवन जीने को मजबूर हैं। यह विकास का मॉडल नहीं, बल्कि आर्थिक असंतुलन की चेतावनी है।


नई अर्थव्यवस्था में कारखानों से ज्यादा कीमत डिजिटल प्लेटफॉर्म की है। कर्मचारियों से ज्यादा अहमियत एल्गोरिद्म की है। एआई ने उत्पादकता बढ़ाई है, लेकिन लाखों युवाओं के भविष्य पर सवाल खड़ा कर दिया है। आईटी सेक्टर, जिसने कभी रोजगार की उम्मीद जगाई थी, अब उसी क्षेत्र में मशीनें इंसानों की जगह लेने लगी हैं।


सरकार कहती है कि देश आगे बढ़ रहा है। यदि ऐसा है तो फिर चपरासी की कुछ हजार नौकरियों के लिए लाखों आवेदन क्यों आते हैं? क्यों पीएचडी, इंजीनियर और स्नातकोत्तर युवा छोटी-सी सरकारी नौकरी के लिए लाइन में खड़े दिखाई देते हैं? क्या यह आत्मनिर्भर भारत की तस्वीर है, या अवसरों के सिकुड़ते दायरे का प्रमाण?


सबसे गंभीर सवाल सरकारों से है। क्या मुफ्त योजनाएं स्थायी समाधान हैं? क्या हर चुनाव से पहले नई घोषणाएं और नई रियायतें ही विकास का पैमाना बन जाएंगी? यदि देश की दो-तिहाई से अधिक आबादी किसी न किसी सरकारी सहायता पर निर्भर हो जाए, तो यह सफलता नहीं, आर्थिक व्यवस्था की कमजोरी का संकेत है।


देश में पूंजी बढ़ रही है, लेकिन श्रम की कीमत घट रही है। मुनाफा बढ़ रहा है, लेकिन वेतन नहीं। जीडीपी ऊपर जा रही है, मगर आम आदमी की जेब खाली होती जा रही है। यही वह खाई है, जो आने वाले वर्षों में सामाजिक तनाव और राजनीतिक अस्थिरता को जन्म दे सकती है।


लोकतंत्र केवल चुनाव जीतने का नाम नहीं है। लोकतंत्र का अर्थ है कि विकास का लाभ अंतिम व्यक्ति तक पहुंचे। यदि विकास केवल शेयर बाजार के आंकड़ों और अरबपतियों की सूची तक सीमित रह जाए, तो वह लोकतंत्र नहीं, आर्थिक विषमता का उत्सव बन जाता है।


सरकारों को यह तय करना होगा कि वे रोजगार आधारित अर्थव्यवस्था बनाना चाहती हैं या मुफ्त योजनाओं पर टिके समाज का निर्माण करना चाहती हैं। क्योंकि मुफ्त की रेवड़ियां वोट तो दिला सकती हैं, लेकिन रोजगार, सम्मान और आत्मनिर्भरता नहीं।


भारत आज एक ऐतिहासिक मोड़ पर खड़ा है। यदि समय रहते आर्थिक विकास का लाभ समाज के हर वर्ग तक नहीं पहुंचाया गया, तो आने वाला दशक विकास का नहीं, विषमता, बेरोजगारी और सामाजिक असंतोष का दशक बन सकता है।

 स्पष्ट मत है—सिर्फ बढ़ती जीडीपी से राष्ट्र महान नहीं बनता। महान राष्ट्र वह है, जहां विकास के फल पर हर नागरिक का समान अधिकार हो, न कि केवल पूंजी के मालिकों का।

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