प्रणव बजाज
भोपाल/बौद्धिक प्रतिकार। मध्य प्रदेश स्टेट सिविल सप्लाइज कॉर्पोरेशन (एमपीएससीएससी) द्वारा खाद्यान्न की गुणवत्ता जांच के लिए एआई आधारित मशीनों को खरीदने के बजाय सात वर्ष के लिए किराये पर लेने की प्रस्तावित व्यवस्था को लेकर गंभीर सवाल उठ रहे हैं। मीडिया रिपोर्टों के अनुसार लगभग 200 करोड़ रुपये में खरीदी जा सकने वाली मशीनों पर करीब 1200 करोड़ रुपये तक किराया भुगतान की संभावना जताई गई है, जिससे टेंडर प्रक्रिया और वित्तीय निर्णयों पर बहस तेज हो गई है।
मुख्य तथ्य
खाद्यान्न जांच के लिए एआई आधारित मशीनें प्रस्तावित।
शुरुआती चरण में लगभग 2500 मशीनें, बाद में संख्या बढ़ाने का प्रावधान।
सात वर्ष तक किराये का मॉडल।
अनुमान है कि खरीद की तुलना में कई गुना अधिक भुगतान हो सकता है।
टेंडर की पात्रता शर्तों और प्रतिस्पर्धा पर भी सवाल उठाए जा रहे हैं।
विपक्ष और विशेषज्ञों के सवाल
जब मशीनें खरीदी जा सकती हैं तो किराये का विकल्प क्यों?
सात साल का अनुबंध क्या सरकारी हित में है?
क्या लागत-लाभ का स्वतंत्र अध्ययन कराया गया?
पात्रता शर्तें कहीं प्रतिस्पर्धा सीमित तो नहीं करतीं?
क्या पूरी प्रक्रिया सार्वजनिक जांच के लिए उपलब्ध कराई जाएगी?
अधिकारियों की आपत्ति
रिपोर्टों के अनुसार टेंडर की वैधता अवधि समाप्त होने के बाद भी प्रक्रिया जारी रहने और बाद में अवधि बढ़ाने के निर्णय पर भी सवाल उठे हैं। यह भी दावा किया गया है कि कुछ अधिकारियों ने आपत्ति दर्ज कराई थी, जिससे विवाद और बढ़ गया।
बौद्धिक प्रतिकार की पड़ताल
यदि मशीनों की वास्तविक खरीद लागत लगभग 200 करोड़ रुपये है और किराये पर कुल भुगतान 1200 करोड़ रुपये तक पहुंचता है, तो यह सार्वजनिक धन के उपयोग का गंभीर विषय बनता है। ऐसे मामलों में पारदर्शिता, स्वतंत्र तकनीकी मूल्यांकन और वित्तीय औचित्य सार्वजनिक होना आवश्यक है।
पूछे जाने वाले पांच सवाल
खरीद के बजाय किराये का मॉडल क्यों चुना गया?
लागत का स्वतंत्र वित्तीय मूल्यांकन किसने किया?
सात वर्ष का अनुबंध किस आधार पर तय हुआ?
पात्रता शर्तों से कितनी कंपनियां बाहर हुईं?
क्या पूरी टेंडर फाइल और मूल्यांकन रिपोर्ट सार्वजनिक की जाएगी?

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