केरल में प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) के अधिकारियों पर हमला केवल किसी एजेंसी पर हमला नहीं, बल्कि कानून के शासन को खुली चुनौती है। यदि जांच एजेंसियों के अधिकारी भी अपने कर्तव्य का निर्वहन करते समय सुरक्षित नहीं हैं, तो आम नागरिक की सुरक्षा का अंदाजा सहज लगाया जा सकता है।
केरल हाईकोर्ट ने इस मामले में चार और आरोपियों को जमानत दी है। यह न्यायिक प्रक्रिया का हिस्सा है और जमानत का अर्थ दोषमुक्त होना नहीं है। अदालत ने आरोपियों पर जांच में सहयोग करने, गवाहों को प्रभावित न करने, सबूतों से छेड़छाड़ न करने तथा आवश्यकता पड़ने पर जांच अधिकारी के समक्ष उपस्थित होने जैसी शर्तें लगाई हैं। न्यायालय का उद्देश्य व्यक्तिगत स्वतंत्रता और निष्पक्ष जांच—दोनों के बीच संतुलन बनाए रखना है।
लेकिन बड़ा सवाल अदालत के फैसले से आगे का है। आखिर ऐसी स्थिति क्यों बन रही है कि जांच एजेंसियों की टीमों पर हमले हो रहे हैं? यदि कानून लागू करने वाले ही निशाने पर होंगे, तो कानून का सम्मान कैसे बचेगा?
लोकतंत्र में किसी भी एजेंसी के कामकाज पर सवाल उठाना नागरिक का अधिकार है। यदि जांच पक्षपातपूर्ण लगे तो उसका कानूनी और संवैधानिक विरोध होना चाहिए। लेकिन हिंसा, हमला और डराने की राजनीति किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था में स्वीकार नहीं की जा सकती।
सरकारों और जांच एजेंसियों की भी जिम्मेदारी है कि उनकी कार्रवाई पूरी तरह पारदर्शी, निष्पक्ष और कानून के दायरे में हो। वहीं राजनीतिक दलों और संगठनों की जिम्मेदारी है कि वे अपने समर्थकों को कानून हाथ में लेने के लिए कभी प्रोत्साहित न करें।
लोकतंत्र अदालतों से चलता है, भीड़ से नहीं। यदि जांच का जवाब पत्थरों और लाठियों से दिया जाएगा, तो सबसे बड़ा नुकसान न्याय व्यवस्था और संविधान का होगा। कानून का सम्मान ही लोकतंत्र की सबसे बड़ी ताकत है।

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