नई दिल्ली। देश की सभी गैर-बैंकिंग वित्तीय कंपनियां (एनबीएफसी) एक जैसे नियमों के तहत काम नहीं करतीं। जिन कंपनियों का आकार बहुत बड़ा होता है या जिनका वित्तीय प्रणाली पर अधिक प्रभाव पड़ सकता है, उन्हें भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) ‘अपर लेयर एनबीएफसी’ (एनबीएफसी-यूएल) की श्रेणी में रखता है।
इस श्रेणी की कंपनियों पर सामान्य एनबीएफसी की तुलना में कहीं अधिक कड़े नियामकीय प्रावधान लागू होते हैं। इनका उद्देश्य वित्तीय व्यवस्था को सुरक्षित रखना और किसी बड़ी कंपनी के संकट का असर पूरे बैंकिंग तंत्र पर पड़ने से रोकना है।
आरबीआई के नियमों के अनुसार, अपर लेयर एनबीएफसी को बैंकों की तरह कम से कम 9 प्रतिशत कॉमन इक्विटी टियर-1 (सीईटी-1) पूंजी बनाए रखनी होती है। इसके साथ ही इन कंपनियों को नकदी उपलब्धता, जोखिम प्रबंधन, कॉरपोरेट गवर्नेंस और आंतरिक नियंत्रण से जुड़े कड़े मानकों का भी पालन करना पड़ता है।
विशेषज्ञों का कहना है कि जिन एनबीएफसी का कारोबार बहुत बड़ा हो या जिनके विफल होने से वित्तीय व्यवस्था प्रभावित होने की आशंका हो, उन्हें इस श्रेणी में शामिल किया जाता है। इसलिए इन पर निगरानी भी अधिक सख्ती से रखी जाती है।
आरबीआई की यह व्यवस्था वित्तीय क्षेत्र में पारदर्शिता बढ़ाने, जमाकर्ताओं और निवेशकों के हितों की रक्षा करने तथा देश की बैंकिंग और वित्तीय प्रणाली को अधिक मजबूत और स्थिर बनाए रखने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम मानी जाती है।

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