नई दिल्ली। देश के सरकारी बैंकों के मजबूत होते वित्तीय प्रदर्शन के बीच बैंकिंग क्षेत्र में बड़े बदलाव की चर्चा फिर तेज हो गई है। प्रधानमंत्री की आर्थिक सलाहकार परिषद से जुड़े एक अध्ययन में सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों के विलय का सुझाव दिया गया है। मकसद ऐसे बड़े बैंक तैयार करना है जो भारतीय अर्थव्यवस्था की बढ़ती जरूरतों के साथ वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धा कर सकें।
पिछले कुछ वर्षों में सरकारी बैंकों की वित्तीय स्थिति में उल्लेखनीय सुधार हुआ है। खराब कर्ज यानी गैर-निष्पादित परिसंपत्तियों में कमी, वसूली में सुधार और मुनाफे में बढ़ोतरी ने सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों को पहले के मुकाबले मजबूत स्थिति में पहुंचाया है।
ऐसे समय में सवाल यह है कि क्या छोटे और मध्यम आकार के सरकारी बैंकों को मिलाकर कुछ बड़े बैंक बनाए जाएं। समर्थकों का तर्क है कि बड़े बैंक अधिक पूंजी जुटा सकते हैं, बड़े बुनियादी ढांचा और औद्योगिक प्रोजेक्ट को वित्त दे सकते हैं तथा अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारतीय बैंकिंग की पहुंच बढ़ा सकते हैं।
भारत में इससे पहले भी सरकारी बैंकों का विलय हो चुका है। कई बैंकों को मिलाकर बड़े बैंक बनाए गए और भारतीय स्टेट बैंक के सहयोगी बैंकों का भी एकीकरण हुआ। इन कदमों के बाद देश के सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकिंग ढांचे में बड़ा बदलाव आया।
लेकिन विलय अपने आप में आसान समाधान नहीं है। अलग-अलग बैंकों की तकनीकी व्यवस्था, शाखा नेटवर्क, कर्मचारियों की सेवा शर्तें, प्रबंधन संस्कृति और कर्ज खातों का एकीकरण बड़ी चुनौती हो सकता है। बड़े बैंक बनने के साथ “बहुत बड़ा तो जोखिम से परे” जैसी स्थिति भी पैदा नहीं होनी चाहिए।
फिलहाल इसे तत्काल विलय की घोषणा नहीं, बल्कि बैंकिंग क्षेत्र को लेकर नीति बहस के रूप में देखना चाहिए। यदि सरकार आगे बढ़ती है तो सवाल केवल यह नहीं होगा कि बैंक कितने बड़े बनें, बल्कि यह भी होगा कि बड़े बैंक आम ग्राहक, छोटे कारोबार और अर्थव्यवस्था के लिए कितने उपयोगी साबित होते हैं।

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