प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने शीर्ष नौकरशाहों को स्पष्ट संदेश दिया है कि सरकार और युवाओं के बीच संवाद केवल औपचारिक बैठकों तक सीमित नहीं रहना चाहिए। उन्होंने अधिकारियों से युवाओं तथा विश्वविद्यालयों के साथ सीधे जुड़ाव बढ़ाने और नीति निर्माण में नई पीढ़ी की भागीदारी सुनिश्चित करने पर जोर दिया। यह निर्देश 20 अगस्त को हुई उच्चस्तरीय बैठक में दिए गए।
प्रधानमंत्री ने प्रशासनिक व्यवस्था में विभागों के अलग-अलग दायरों में काम करने वाली ‘साइलो’ संस्कृति को बड़ी चुनौती बताया। उनका जोर इस बात पर रहा कि अलग-अलग विभाग आपसी समन्वय बढ़ाएं और जमीनी स्तर पर परिणाम देने वाली व्यवस्था तैयार करें।
युवाओं से संवाद बढ़ाने का निर्देश इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि देश की बड़ी युवा आबादी केवल सरकारी योजनाओं की लाभार्थी नहीं, बल्कि नीति और विकास प्रक्रिया की सक्रिय भागीदार बन सकती है। विश्वविद्यालयों को इस संवाद का महत्वपूर्ण केंद्र बनाने से शोध, नवाचार, रोजगार, तकनीक और कौशल विकास से जुड़े फैसलों में छात्रों और शिक्षाविदों की वास्तविक भागीदारी बढ़ सकती है।
प्रधानमंत्री ने कृत्रिम बुद्धिमत्ता के प्रभावी इस्तेमाल पर भी जोर दिया। स्वतंत्रता दिवस पर वे एक करोड़ युवाओं को कृत्रिम बुद्धिमत्ता का प्रशिक्षण देने की घोषणा कर चुके हैं।
अब असली परीक्षा नौकरशाही की है। निर्देश जारी करना आसान है, लेकिन उसका असर तभी दिखेगा जब सचिवालयों की फाइलों से निकलकर अधिकारी विश्वविद्यालयों के परिसरों, प्रयोगशालाओं और युवाओं के बीच पहुंचेंगे।
सवाल यही है—क्या नौकरशाही युवाओं को केवल योजनाओं का लाभार्थी मानेगी, या उन्हें देश की नीतियां गढ़ने वाला भागीदार भी बनाएगी?

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