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पीढ़ी तो यही काम करेगी, लेकिन क्या हम उसे मौका देंगे?

 


प्रणव बजाज, प्रमुख संपादक


2047 का विकसित भारत केवल सरकारी घोषणाओं, चमचमाती सड़कों, ऊंची इमारतों और बड़ी अर्थव्यवस्था से नहीं बनेगा। असली सवाल यह है कि उस भारत को चलाएगा कौन? जवाब साफ है—आज की जेन-जी और जेन अल्फा।



जो बच्चे आज कृत्रिम बुद्धिमत्ता को खेल की तरह समझ रहे हैं, वही कल संसद, न्यायपालिका, प्रशासन, विज्ञान, उद्योग और विश्वविद्यालयों में फैसले लेंगे। इसलिए विकसित भारत का सपना दरअसल आज की पीढ़ी की तैयारी का सवाल है।


हमने युवाओं को तकनीक तो दे दी, लेकिन क्या उन्हें अवसर, गुणवत्तापूर्ण शिक्षा और स्वतंत्र सोच भी दी? मोबाइल हाथ में है, इंटरनेट हाथ में है, लेकिन लाखों युवाओं के सामने रोजगार की अनिश्चितता है। प्रतियोगिता बढ़ रही है, मानसिक दबाव बढ़ रहा है और सफलता का पैमाना लगातार धन, प्रसिद्धि और दिखावे तक सिमटता जा रहा है।


यहीं हमारी सबसे बड़ी चिंता है।


कृत्रिम बुद्धिमत्ता तेज दिमाग दे सकती है, लेकिन चरित्र नहीं। तकनीक निर्णय लेने में मदद कर सकती है, लेकिन सही निर्णय की नैतिकता नहीं सिखा सकती। इसलिए विकसित भारत का निर्माण केवल तकनीकी दक्ष युवाओं से नहीं, बल्कि जिम्मेदार और संवेदनशील नागरिकों से होगा।


महात्मा गांधी का विचार आज इसी जगह प्रासंगिक हो जाता है। विकास का अर्थ केवल आगे बढ़ना नहीं, बल्कि यह सुनिश्चित करना भी है कि विकास का लाभ अंतिम व्यक्ति तक पहुंचे। आज इसकी नई व्याख्या यही है—तकनीक आधुनिक हो, शासन पारदर्शी हो और व्यवस्था में इंसान की गरिमा सर्वोच्च हो।


लेकिन जिम्मेदारी केवल युवाओं की नहीं है। परिवार को संवाद देना होगा, शिक्षा व्यवस्था को रटने के बजाय सोचने की क्षमता देनी होगी और सरकार को अवसरों का समान मैदान तैयार करना होगा। प्रतिभा किसी बड़े शहर, महंगे विद्यालय या प्रभावशाली परिवार की बपौती नहीं हो सकती।


2047 की तैयारी आज हो रही है। इसलिए सवाल यह नहीं कि जेन-जी और जेन अल्फा देश को बदल पाएंगे या नहीं। सवाल यह है कि हम उन्हें बदलने का अवसर देंगे या नहीं।


क्योंकि विकसित भारत की सबसे बड़ी परियोजना कोई सड़क, पुल या कारखाना नहीं—एक सक्षम, चरित्रवान और स्वतंत्र सोच वाली पीढ़ी है। अगर यह निवेश चूक गया, तो 2047 का सपना आंकड़ों में विकसित और इंसानों में अधूरा भारत बनकर रह जाएगा।

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