मामले की सुनवाई के दौरान अदालत ने निजी संस्थाओं द्वारा ईपीएफओ और आयकर रिकॉर्ड तक संभावित पहुंच को “चिंताजनक” बताया। अदालत ने कहा कि कानून के तहत सरकार को दी गई व्यक्तिगत जानकारी की सुरक्षा सुनिश्चित करना जरूरी है। साथ ही केंद्र को क्षेत्र के विशेषज्ञों की मदद से प्रभावी व्यवस्था तैयार करने और निजी संस्थाओं द्वारा डेटा के दुरुपयोग को रोकने के लिए आवश्यक कदम उठाने को कहा गया।
यह मामला एक जनहित याचिका से जुड़ा था। याचिकाकर्ता ने दावा किया कि निजी सत्यापन व्यवस्था में केवल पैन और यूएएन जैसी जानकारी देने पर रोजगार से जुड़ा पूरा इतिहास सामने आ सकता है। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि ऐसी प्रक्रिया में हर बार स्पष्ट सहमति, ओटीपी या अधिकृत पहचान सत्यापन की व्यवस्था दिखाई नहीं देती।
हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने यह नहीं कहा कि सरकारी एजेंसियों से डेटा लीक हुआ है या निजी कंपनियों को नागरिकों के ईपीएफओ अथवा आयकर रिकॉर्ड तक खुली पहुंच हासिल है। अदालत ने फिलहाल मुद्दे को मुख्यतः नीतिगत विषय माना, लेकिन संभावित दुरुपयोग को गंभीरता से लेते हुए केंद्र को सुरक्षा तंत्र मजबूत करने की दिशा में कदम उठाने को कहा है।
मामला इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि रोजगार, आय और वित्तीय गतिविधियों से जुड़ा डेटा किसी व्यक्ति की निजी जिंदगी की बेहद संवेदनशील जानकारी हो सकता है। सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी ने डेटा सुरक्षा और नागरिकों की निजता को लेकर सरकार की जिम्मेदारी पर नई बहस छेड़ दी है।

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