उज्जैन-जावरा की निविदा ने खोली बड़े ठेको के खिलाड़ियों की फाइल, कुछ पर कार्रवाई तो कुछ के रिकॉर्ड में गंभीर सवाल
प्रणव बजाज
मध्यप्रदेश अगले पांच वर्षों में 29,682 किलोमीटर सड़कों के निर्माण और उन्नयन पर 88,634 करोड़ रुपये खर्च करने की तैयारी में है। इतनी बड़ी राशि के साथ अब सिर्फ यह सवाल पर्याप्त नहीं कि सड़क किसे बनाने दी जाएगी।
सवाल यह भी है—
जिस कंपनी को हजारों करोड़ का काम दिया जाएगा, उसका पिछला रिकॉर्ड क्या है?
उज्जैन-जावरा नियंत्रित प्रवेश वाले चार लेन मार्ग की करीब 2,029.49 करोड़ रुपये की निविदा में कई बड़े निर्माण समूह मैदान में उतरे। बंसल कंस्ट्रक्शन वर्क्स ने 1,676.36 करोड़ रुपये की सबसे कम बोली लगाई। इसके बाद सीडीएस इंफ्रा 1,962 करोड़, पीएनसी इंफ्राटेक 1,980 करोड़, गावर कंस्ट्रक्शन 1,994.99 करोड़ और एमकेसी इंफ्रास्ट्रक्चर 1,998.98 करोड़ रुपये की बोली के साथ सामने आए। जीआर इंफ्राप्रोजेक्ट्स की बोली 2,054.77 करोड़ रुपये थी।
अब इन नामों को सिर्फ निविदा की रकम से नहीं, बल्कि इनके सार्वजनिक रिकॉर्ड से पढ़ना जरूरी है।
1. सीडीएस इंफ्रा : सड़क की खराबी पर सीधे एनएचएआई की कार्रवाई
उज्जैन-जावरा निविदा में 1,962 करोड़ रुपये की बोली लगाने वाली सीडीएस इंफ्रा प्रोजेक्ट्स लिमिटेड के मामले में रिकॉर्ड सबसे स्पष्ट है।
जुलाई 2025 में भारतीय राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण ने कंपनी को तत्काल प्रभाव से चालू और भविष्य की निविदाओं में भाग लेने से रोक दिया था।
कारण था—अमृतसर-जामनगर आर्थिक गलियारे के सांचौर-सांतलपुर हिस्से में सड़क की परत की विफलता।
एनएचएआई ने कंपनी को अपने खर्च पर दोष दूर करने का निर्देश दिया और 2.8 करोड़ रुपये के दंड के संबंध में कारण बताओ नोटिस भी जारी किया।
यह मध्यप्रदेश में कंपनी द्वारा किसी भ्रष्टाचार का प्रमाण नहीं है।
लेकिन 88,634 करोड़ रुपये की सड़क योजना में सवाल जरूर खड़ा करता है—
जिस कंपनी पर राष्ट्रीय राजमार्ग की गुणवत्ता को लेकर एनएचएआई को प्रतिबंध और दंडात्मक कार्रवाई करनी पड़ी, उसका पिछला रिकॉर्ड मध्यप्रदेश की नई निविदाओं में कितनी गंभीरता से जांचा जाता है?
यही सरकार को बताना चाहिए।
2. एमकेसी इंफ्रास्ट्रक्चर : न्यायालय के रिकॉर्ड में सत्यनिष्ठा समझौते का सवाल
उज्जैन-जावरा निविदा में एमकेसी इंफ्रास्ट्रक्चर लिमिटेड की बोली 1,998.98 करोड़ रुपये थी।
इस कंपनी का मामला और गंभीर इसलिए है क्योंकि दिल्ली उच्च न्यायालय के रिकॉर्ड में एनएचएआई के एक अनुबंध से जुड़े इंटीग्रिटी पैक्ट के उल्लंघन का मामला दर्ज है।
न्यायालय के रिकॉर्ड के अनुसार कंपनी के संबंध में जांच रिपोर्ट में प्रथम दृष्टया इंटीग्रिटी पैक्ट के अनुच्छेद-2 के उल्लंघन की बात सामने आई थी। कंपनी ने अपने खिलाफ हुई कार्रवाई को चुनौती भी दी थी।
दिल्ली उच्च न्यायालय ने जनवरी 2023 में यह भी दर्ज किया कि कंपनी के खिलाफ लगाया गया प्रतिबंध प्रथम दृष्टया निलंबित करने योग्य नहीं था और मामले में सार्वजनिक परियोजनाओं की ईमानदारी का प्रश्न गंभीर है।
अब सवाल मध्यप्रदेश सरकार से—
क्या ऐसे रिकॉर्ड वाले ठेकेदार की नई पात्रता जांच सिर्फ कागजों तक सीमित रहती है या वास्तव में उसके पुराने आचरण को निविदा मूल्यांकन में महत्व दिया जाता है?
3. पीएनसी इंफ्राटेक : सड़क की गुणवत्ता से लेकर जांच तक सवाल
पीएनसी इंफ्राटेक लिमिटेड ने उज्जैन-जावरा परियोजना में 1,980 करोड़ रुपये की बोली लगाई थी।
कंपनी का नाम मध्यप्रदेश की कई बड़ी सड़क परियोजनाओं की निविदाओं में भी दिखाई देता है।
लेकिन अगस्त 2026 में लखनऊ-कानपुर एक्सप्रेसवे की स्थिति ने फिर सवाल खड़े किए। उद्घाटन के कुछ ही समय बाद सड़क के एक हिस्से में गंभीर क्षति सामने आई। एनएचएआई ने टोल वसूली रोक दी और संबंधित परियोजना से जुड़े पक्षों के खिलाफ कार्रवाई शुरू की। तकनीकी जांच के लिए विशेषज्ञों की मदद भी ली गई।
मामला यहीं खत्म नहीं होता। उपलब्ध न्यायालयीन रिकॉर्ड में पीएनसी से जुड़ी परियोजनाओं के संदर्भ में इंटीग्रिटी पैक्ट और जांच संबंधी कार्यवाही का भी उल्लेख मिलता है। दिल्ली उच्च न्यायालय के 2024 के आदेश में पीएनसी से संबंधित खजुराहो-बुंदेलखंड परियोजना के संदर्भ में एनएचएआई की कारण बताओ कार्रवाई का उल्लेख है।
हालांकि यहां सावधानी जरूरी है।
पीएनसी इंफ्राटेक को सीधे भ्रष्ट या प्रतिबंधित कंपनी कहना उपलब्ध दस्तावेजों के आधार पर उचित नहीं होगा। कंपनी ने हाल की लखनऊ-कानपुर कार्रवाई पर कहा है कि उसे स्वयं प्रतिबंधित नहीं किया गया है और कार्रवाई उसकी सहायक कंपनी/रियायतधारी से संबंधित है।
इसलिए सवाल आरोप का नहीं, जवाबदेही का है—
क्या मध्यप्रदेश में किसी कंपनी की देशभर की हालिया गुणवत्ता और कानूनी कार्रवाई का रिकॉर्ड नई निविदा से पहले स्वतंत्र रूप से जांचा जाता है?
4. गावर कंस्ट्रक्शन : सड़क निर्माण के साथ पर्यावरणीय सवाल
उज्जैन-जावरा परियोजना में गावर कंस्ट्रक्शन लिमिटेड की बोली 1,994.99 करोड़ रुपये थी।
कंपनी के खिलाफ हिमाचल प्रदेश में सड़क निर्माण से जुड़े मलबे के निस्तारण का मामला सामने आया।
राष्ट्रीय हरित अधिकरण से संबंधित संयुक्त समिति ने बीस दिसंबर 2025 के निरीक्षण के बाद बीआस नदी और उसकी सहायक धारा के आसपास कथित अनधिकृत और अवैज्ञानिक मलबा डंपिंग का उल्लेख किया। समिति ने छह स्थानों के लिए कुल छह लाख रुपये पर्यावरणीय क्षतिपूर्ति की सिफारिश की।
यह मध्यप्रदेश की सड़क परियोजना में गड़बड़ी का प्रमाण नहीं है।
लेकिन सवाल फिर वही है—
क्या मध्यप्रदेश में हजारों करोड़ रुपये के सड़क ठेके देने से पहले कंपनियों के राष्ट्रीय स्तर के पर्यावरणीय और निर्माण रिकॉर्ड की जांच होती है?
चार कंपनियां, चार अलग-अलग सवाल
यहां सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि चारों कंपनियों को एक ही तराजू से नहीं तौला जा सकता।
सीडीएस इंफ्रा — एनएचएआई की कार्रवाई और प्रतिबंध का स्पष्ट सरकारी रिकॉर्ड।
एमकेसी इंफ्रास्ट्रक्चर — न्यायालयीन रिकॉर्ड में इंटीग्रिटी पैक्ट उल्लंघन और प्रतिबंध संबंधी कार्यवाही।
पीएनसी इंफ्राटेक — हालिया सड़क क्षति और उससे जुड़ी एनएचएआई कार्रवाई, साथ ही पुराने इंटीग्रिटी पैक्ट संबंधी न्यायालयीन रिकॉर्ड; लेकिन कंपनी को सीधे भ्रष्ट या प्रतिबंधित कहना उचित नहीं।
गावर कंस्ट्रक्शन — हिमाचल में मलबा डंपिंग को लेकर एनजीटी से जुड़ी समिति की कार्रवाई और पर्यावरणीय क्षतिपूर्ति की सिफारिश।
यही अंतर खबर को विश्वसनीय बनाता है।
अब मध्यप्रदेश सरकार से सीधा सवाल
88,634 करोड़ रुपये की सड़क योजना में सरकार को केवल ठेकेदार की सबसे कम बोली नहीं देखनी चाहिए।
उसे यह भी बताना चाहिए—
किस कंपनी पर पिछले दस वर्षों में देश के किसी भी सरकारी विभाग ने कार्रवाई की?
किस कंपनी को कभी प्रतिबंधित किया गया?
किस कंपनी से दंड वसूला गया?
किस कंपनी की सड़क गुणवत्ता पर सरकारी जांच हुई?
किस कंपनी के खिलाफ इंटीग्रिटी पैक्ट या भ्रष्टाचार संबंधी कार्रवाई चली?
और सबसे महत्वपूर्ण—
क्या इन सभी रिकॉर्ड को मध्यप्रदेश की निविदा समिति ने देखा है?
कर्ज मध्यप्रदेश का, ठेका हजारों करोड़ का—जांच कौन करेगा?
मध्यप्रदेश की जनता सड़क चाहती है।
लेकिन जनता ऐसी सड़क नहीं चाहती जो उद्घाटन के कुछ समय बाद मरम्मत मांगने लगे।
जनता ऐसा ठेका भी नहीं चाहती जिसमें सबसे कम बोली देखकर पूरी फाइल बंद कर दी जाए।
ठेका कम कीमत पर देना अच्छी बात है।
लेकिन ठेकेदार का पिछला रिकॉर्ड देखे बिना ठेका देना जोखिम है।
88,634 करोड़ रुपये का सवाल सिर्फ विकास का नहीं है।
यह सार्वजनिक धन, निर्माण की गुणवत्ता और सरकारी जवाबदेही का सवाल है।
और अब सरकार को एक सीधा जवाब देना चाहिए—
उज्जैन-जावरा की निविदा में शामिल कंपनियों के खिलाफ देशभर में हुई कार्रवाई का रिकॉर्ड मध्यप्रदेश सरकार ने जांचा है या नहीं?
अगर जांचा है तो उसकी रिपोर्ट सार्वजनिक कीजिए।
अगर नहीं जांचा है तो 88,634 करोड़ रुपये की अगली सड़क पर पहला पत्थर रखने से पहले यही काम कीजिए।
क्योंकि सड़क टूटने के बाद ठेकेदार पर कार्रवाई करना आसान है—
लेकिन जनता का पैसा खर्च होने से पहले सही ठेकेदार चुनना सरकार की असली परीक्षा है।

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