नई दिल्ली। विदेश जाकर पढ़ाई करने का बढ़ता चलन अब कुछ हद तक धीमा पड़ता दिखाई दे रहा है। पिछले तीन वर्षों में विदेश जाने वाले भारतीय छात्रों की संख्या में करीब 40 प्रतिशत तक की गिरावट दर्ज की गई है। कड़े वीजा नियम, बढ़ती फीस, महंगा आवास और रोजमर्रा के खर्च ने विद्यार्थियों और उनके परिवारों की आर्थिक चिंता बढ़ा दी है।
कई देशों ने हाल के वर्षों में छात्र वीजा को लेकर नियम सख्त किए हैं। वीजा प्रक्रिया में बढ़ती जांच और वित्तीय क्षमता साबित करने की शर्तों ने छात्रों के लिए विदेश में शिक्षा हासिल करना पहले की तुलना में कठिन बना दिया है।
इसके साथ ही विदेशों में रहने का खर्च भी तेजी से बढ़ा है। शिक्षा शुल्क के अलावा मकान का किराया, भोजन, स्वास्थ्य बीमा और परिवहन पर होने वाला खर्च भारतीय परिवारों के बजट पर भारी पड़ रहा है। रुपये की कमजोर विनिमय दर ने भी विदेश में पढ़ाई को और महंगा बनाया है।
विशेषज्ञों के मुताबिक पहले जहां विदेशी डिग्री को बेहतर रोजगार और स्थायी करियर का रास्ता माना जाता था, वहीं अब भारत में उच्च शिक्षा के विकल्प और रोजगार के अवसर बढ़ने से विद्यार्थी घरेलू संस्थानों पर भी विचार कर रहे हैं।
हालांकि, विदेश शिक्षा की मांग पूरी तरह खत्म नहीं हुई है। बेहतर विश्वविद्यालय, शोध के अवसर और वैश्विक अनुभव अब भी छात्रों को आकर्षित करते हैं। लेकिन बदलती नीतियों और बढ़ते खर्च ने छात्रों को विदेश जाने से पहले लागत, वीजा नियम और रोजगार की संभावनाओं का अधिक गंभीरता से आकलन करने के लिए मजबूर कर दिया है।

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