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बंगाल में 34 लाख मतदाता अपीलों का पहाड़, 19 ट्रिब्यूनल पर भारी बोझ; सुप्रीम कोर्ट ने कहा—रफ्तार बढ़ाइए

कोलकाता/नई दिल्ली। पश्चिम बंगाल में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी एसआईआर के बाद नाम हटाए जाने को लेकर दाखिल अपीलों का मामला अब सुप्रीम कोर्ट की निगरानी में है। करीब 34 लाख अपीलें लंबित होने के बीच मंगलवार को सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयोग से ट्रिब्यूनलों में लंबित और निपटाए गए मामलों का विस्तृत आंकड़ा मांगा और सुनवाई की रफ्तार तेज करने की जरूरत जताई। अदालत ने साफ संकेत दिया कि अपीलों का निपटारा अनिश्चितकाल तक नहीं चल सकता। हालांकि उसने फिलहाल कोई निश्चित समय-सीमा तय नहीं की।

19 ट्रिब्यूनल, लाखों मामले और निपटारे की चुनौती

एसआईआर के बाद मतदाता सूची से नाम हटाए जाने या सूची में किसी नाम के शामिल होने पर आपत्ति से जुड़े 34 लाख से अधिक मामले अपीलीय ट्रिब्यूनलों तक पहुंचे हैं। सुप्रीम कोर्ट के अप्रैल के आदेश में भी इस संख्या का उल्लेख किया गया था। अदालत ने कहा था कि इन सभी अपीलों पर निर्धारित प्रक्रिया और प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों के अनुसार फैसला होना चाहिए।



मौजूदा व्यवस्था में 19 अपीलीय ट्रिब्यूनल इन मामलों को देख रहे हैं। रिपोर्टों के मुताबिक करीब 300 मामलों के प्रतिदिन निपटारे की रफ्तार सामने आई है। संख्या को केवल गणित के नजरिए से देखें तो 34 लाख मामलों को 300 प्रतिदिन की दर से निपटाने में लगभग 11,333 कार्यदिवस, यानी करीब 31 वर्ष लग सकते हैं—वह भी तब, जब इस दौरान नए मामले न जुड़ें और यही गति लगातार बनी रहे।


यही वजह है कि अब सवाल सिर्फ कितने नाम हटे या कितने वापस जुड़े, इसका नहीं है। असली सवाल यह है कि जिस नागरिक को अपनी मतदाता पहचान और मतदान के अधिकार पर आपत्ति है, उसे न्याय मिलने में कितना समय लगेगा?


सुप्रीम कोर्ट ने मांगा पूरा हिसाब


11 अगस्त की सुनवाई में सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयोग से यह बताने को कहा कि ट्रिब्यूनलों के सामने कितनी अपीलें दाखिल हुईं, कितनी पर फैसला हुआ और कितनी अभी लंबित हैं। अदालत का हस्तक्षेप इस बात का संकेत है कि वह पूरी प्रक्रिया की गति और प्रभावशीलता पर नजर रख रही है।


अदालत पहले ही निर्देश दे चुकी है कि ट्रिब्यूनल केवल औपचारिकता पूरी न करें, बल्कि संबंधित अभिलेखों और पहले दिए गए कारणों की समीक्षा करते हुए पक्षकारों को उचित सुनवाई का अवसर दें।


सबसे बड़ा सवाल—क्या 19 ट्रिब्यूनल पर्याप्त हैं?


34 लाख से ज्यादा अपीलों के मुकाबले 19 ट्रिब्यूनलों की क्षमता पर सवाल उठना स्वाभाविक है। यदि औसतन 300 मामलों का ही प्रतिदिन निपटारा होता है तो लंबित मामलों का पहाड़ तेजी से कम करना बेहद कठिन होगा।


यह केवल प्रशासनिक आंकड़ा नहीं है। मतदाता सूची लोकतांत्रिक व्यवस्था की बुनियादी कड़ी है। किसी नागरिक का नाम गलत तरीके से हटता है तो उसका प्रभाव सीधे उसके मतदान के अधिकार पर पड़ता है। इसलिए अपील का अधिकार तभी सार्थक है, जब अपील पर समय रहते फैसला भी हो।


अब सुप्रीम कोर्ट की सक्रियता के बाद चुनाव आयोग और ट्रिब्यूनलों के सामने सबसे बड़ी चुनौती यही है कि लाखों मामलों को जल्द निपटाने के साथ-साथ प्रक्रिया की निष्पक्षता भी कायम रखी जाए।

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