इंदौर। हुकुमचंद मिल के मजदूरों के बकाया भुगतान का लंबा संघर्ष भले ही एक बड़े पड़ाव तक पहुंच चुका हो, लेकिन 380 श्रमिक परिवारों का इंतजार अब भी खत्म नहीं हुआ है। मिल की 41 एकड़ जमीन बिकने के करीब दो साल बाद भी इन परिवारों को 80 करोड़ रुपये से अधिक की राशि नहीं मिल पाई है।
मामला उन परिवारों का है, जिनमें मूल श्रमिक और उनकी पत्नी दोनों का निधन हो चुका है और उनके एक से अधिक कानूनी वारिस हैं। इन्हें न्यायालय की प्रक्रिया में ‘थर्ड पार्टी वारिस’ माना गया है। हाईकोर्ट द्वारा गठित समिति ने इन परिवारों के दस्तावेजों और दावों का सत्यापन कर सूची परिसमापक को सौंप दी है, लेकिन भुगतान अब तक अटका हुआ है।
सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब वर्षों की कानूनी लड़ाई के बाद जमीन बेचकर मजदूरों के बकाये का रास्ता साफ हुआ, तो वारिसों की पहचान और सहमति की प्रक्रिया पूरी होने के बाद भी पैसा क्यों नहीं पहुंचा?
दिसंबर 2023 में केंद्र सरकार ने हुकुमचंद मिल के श्रमिकों के बकाये से जुड़े करीब 224 करोड़ रुपये के भुगतान को लंबित मामले के समाधान का प्रतीक बताया था। बाद में भुगतान प्रक्रिया आगे बढ़ी और हजारों श्रमिकों व परिवारों को राशि मिली, लेकिन 380 परिवारों का मामला अभी भी फाइलों और सत्यापन की प्रक्रिया में उलझा है।
**33 साल का इंतजार, जमीन भी बिक गई और रकम भी उपलब्ध है—फिर इन 380 परिवारों को उनका हक कब मिलेगा?**

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