जम्मू-कश्मीर में कश्मीरी पंडितों के खिलाफ हुई पुरानी लक्षित हत्याओं के मामलों पर जांच एजेंसियों ने फिर शिकंजा कसना शुरू कर दिया है। जम्मू-कश्मीर की राज्य जांच एजेंसी ने 1998 के वंधामा नरसंहार की जांच दोबारा शुरू की है। 25 जनवरी 1998 की रात गांदरबल के वंधामा गांव में आतंकियों ने कश्मीरी पंडित परिवारों को निशाना बनाया था। इस हमले में 23 लोगों की हत्या हुई थी, जिनमें नौ महिलाएं और चार बच्चे शामिल थे। मामला करीब तीन दशक तक अनसुलझा रहा।
अब जांच एजेंसी पुराने मामले में नए साक्ष्य जुटाने, आतंकियों और उनके सहयोगियों की पहचान करने तथा वारदात की पूरी साजिश सामने लाने पर काम कर रही है। वंधामा के साथ कश्मीरी पंडितों की अन्य चर्चित हत्याओं के मामलों को भी फिर जांच के दायरे में लाया जा रहा है।
इसी बीच कश्मीरी पंडितों को कथित तौर पर धमकी दिए जाने की खबर ने सुरक्षा चिंता बढ़ा दी है। रिपोर्टों के अनुसार ‘यूनाइटेड लिबरेशन फ्रंट’ नाम से प्रसारित धमकी में कुछ कश्मीरी पंडितों के नाम-पते सार्वजनिक किए गए हैं।
यह संदेश साफ है—वंधामा का हिसाब अब फाइलों में दबा नहीं रहेगा। पुराने अपराधों की जांच दोबारा शुरू होना उन परिवारों के लिए न्याय की उम्मीद है, जिन्होंने दशकों तक जवाब का इंतजार किया है। वहीं नई धमकियां यह सवाल भी खड़ा करती हैं कि क्या आतंक का पुराना चेहरा फिर सिर उठाने की कोशिश कर रहा है?
लेकिन परिस्थितियां बदल चुकी हैं। अब सुरक्षा एजेंसियां पुराने मामलों को भी खोल रही हैं और आतंकवाद के नेटवर्क पर लगातार कार्रवाई कर रही हैं। इसलिए किसी भी आतंकी संगठन की धमकी को केवल बयान समझकर नजरअंदाज करना सुरक्षा व्यवस्था के लिए गंभीर भूल होगी। **कश्मीर में आतंक की वापसी की कोशिश का जवाब कानून, खुफिया तंत्र और सुरक्षा बलों की सख्त कार्रवाई से ही होना चाहिए।**

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