प्रणव बजाज
मध्य प्रदेश की सत्ता की कमान मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव के हाथ में है। उज्जैन उनकी राजनीतिक पहचान का महत्वपूर्ण केंद्र रहा है और मां क्षिप्रा से उनका भावनात्मक जुड़ाव भी सार्वजनिक रूप से सामने आता रहा है। ऐसे में क्षिप्रा की सफाई के नाम पर वर्षों में खर्च हुए करोड़ों रुपये और नदी की मौजूदा हालत अब सीधे सरकार की जवाबदेही का सवाल बन गए हैं।
उपलब्ध रिपोर्टों के मुताबिक वर्ष 2004 से 2022 के बीच क्षिप्रा के प्रवाह और प्रदूषण नियंत्रण से जुड़े कार्यों पर करीब 648 करोड़ रुपये खर्च किए गए। इसके बावजूद नदी में प्रदूषण की समस्या समाप्त नहीं हुई। यही सबसे बड़ा सवाल है—जब पैसा लगातार लगा तो परिणाम कहां गया?
मामला यहीं खत्म नहीं होता।
2024 में प्रशासन ने स्वीकार किया कि पहले बनाए गए एसटीपी और सीवेज लाइनें बढ़ते सीवेज भार को संभालने में सक्षम नहीं रहीं। प्रशासन ने पुरानी डीपीआर की समीक्षा के लिए आईआईटी इंदौर की मदद लेने की बात कही थी।
अब 2026 में फिर 81 करोड़ रुपये की नमामि गंगे परियोजना को मंजूरी दी गई है। इसमें उज्जैन के भैरूगढ़ और पीलियाखाल नालों के पानी को रोककर उपचारित करने के लिए 24.30 एमएलडी क्षमता का एसटीपी प्रस्तावित है।
मोहन यादव से सीधे सवाल
मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव से सवाल पूछना इसलिए जरूरी है क्योंकि यह केवल नदी की सफाई का मामला नहीं, बल्कि सार्वजनिक धन और सरकारी जवाबदेही का मामला है।
648 करोड़ रुपये किन-किन योजनाओं पर खर्च हुए?
किस वर्ष कितनी राशि जारी हुई?
किन अधिकारियों ने तकनीकी स्वीकृति और भुगतान किए?
किन ठेकेदारों को काम मिला और कितना भुगतान हुआ?
जिन परियोजनाओं को सफल बताया गया, वे आज विफल क्यों दिखाई दे रही हैं?
और सबसे बड़ा सवाल—
अगर पुरानी व्यवस्था कारगर थी तो नई योजना की जरूरत क्यों पड़ी?
मुख्यमंत्री मोहन यादव को इस पूरे मामले का वर्षवार और योजनावार श्वेतपत्र सार्वजनिक करना चाहिए। इससे यह भी स्पष्ट होगा कि 648 करोड़ रुपये में वास्तव में क्या काम हुआ और उसकी जमीनी उपयोगिता कितनी रही।
‘पैसा कहां गया’ का सवाल विपक्ष का नहीं, जनता का है
किसी अधिकारी या मुख्यमंत्री पर बिना प्रमाण भ्रष्टाचार का आरोप लगाना आसान है, लेकिन दस्तावेज मांगना पत्रकारिता का काम है। इसलिए सवाल यह नहीं कि “मोहन यादव ने पैसा खाया या नहीं”—ऐसा दावा प्रमाण के बिना नहीं किया जा सकता।
सवाल इससे ज्यादा गंभीर है—
मुख्यमंत्री के कार्यकाल में भी अगर क्षिप्रा प्रदूषण से मुक्त नहीं हो पा रही है, तो सरकार उन अधिकारियों और एजेंसियों की जवाबदेही कब तय करेगी, जिन्होंने वर्षों तक करोड़ों रुपये खर्च किए?
उज्जैन की जनता को नई घोषणा नहीं, पुराने खर्च का हिसाब चाहिए।
क्षिप्रा पूछ रही है—648 करोड़ के बाद भी मैं मैली क्यों हूं?
और अब गेंद सीधे मुख्यमंत्री मोहन यादव के पाले में है।

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