सरकारी राशन व्यवस्था में बड़े पैमाने पर अपात्र लाभार्थियों की पहचान ने पूरी व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। केंद्रीय उपभोक्ता मामले, खाद्य एवं सार्वजनिक वितरण मंत्रालय के आंकड़ों के अनुसार देशभर में करीब 2.44 करोड़ अपात्र लाभार्थी चिन्हित किए गए हैं। इनमें 56,22,619 आयकरदाता और 7,21,343 जीएसटी पंजीकृत कारोबारी शामिल हैं।
मंत्रालय ने संदिग्ध लाभार्थियों के आंकड़ों का आयकर, जीएसटी, कंपनी मामलों और परिवहन विभाग के आंकड़ों से मिलान किया। जांच में 10.77 लाख से ज्यादा दोहरे राशन कार्ड, करीब 2.76 लाख सरकारी कर्मचारी, 2.42 लाख कंपनी निदेशक और 2.07 लाख चार पहिया वाहन मालिक भी सामने आए हैं। सबसे बड़ी संख्या ऐसे लाभार्थियों की बताई गई है जिन्होंने महीनों से राशन ही नहीं लिया—इनकी संख्या करीब 1.58 करोड़ है।
सरकार का अनुमान है कि इन अपात्र नामों को हटाने से करीब 5,800 करोड़ रुपये सालाना की खाद्य सब्सिडी बच सकती है। लेकिन असली सवाल बचत से बड़ा है—गरीब के हिस्से का राशन इतने वर्षों तक अपात्र लोगों के नाम पर कैसे चलता रहा?
अब राज्यों की जिम्मेदारी है कि सूची मिलने के बाद स्थानीय स्तर पर अंतिम सत्यापन करें। किसी व्यक्ति का आयकरदाता या जीएसटी पंजीकृत होना अकेले हर मामले में अपात्रता का अंतिम प्रमाण नहीं माना जा सकता; पात्रता संबंधित योजना के नियमों और वास्तविक स्थिति से तय होगी। इसलिए कार्रवाई से पहले निष्पक्ष सत्यापन जरूरी है।
लेकिन अगर जांच के बाद ये नाम सचमुच अपात्र साबित होते हैं तो सवाल सीधा है—राशन व्यवस्था की निगरानी करने वाले तंत्र ने इतने बड़े पैमाने पर यह गड़बड़ी पहले क्यों नहीं पकड़ी? अब सरकार को सिर्फ कार्ड काटने से आगे बढ़कर यह भी बताना चाहिए कि अपात्रता कब से थी, कितना राशन उठाया गया और जिम्मेदारी किसकी तय होगी।

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