अमेरिका ने अपनी सैन्य ऊर्जा सुरक्षा को मजबूत करने के लिए बड़ा कदम उठाया है। अमेरिकी सेना ने पांच सैन्य ठिकानों पर परमाणु माइक्रोरिएक्टर विकसित करने और संचालित करने के लिए पांच कंपनियों को चुना है। इस योजना के तहत अगले पांच वर्षों में कुल 2.2 अरब डॉलर तक की सरकारी राशि उपलब्ध कराई जाएगी और सेना को उम्मीद है कि रक्षा प्रतिष्ठानों पर 20 से अधिक माइक्रोरिएक्टर लगाए जा सकते हैं।
चुने गए ठिकानों में फोर्ट ब्रैग, नॉर्थ कैरोलाइना; फोर्ट कैंपबेल, केंटकी; फोर्ट हूड, टेक्सास; फोर्ट बेनिंग, जॉर्जिया और फोर्ट ड्रम, न्यूयॉर्क शामिल हैं। इनके लिए क्रमशः एंटारेस न्यूक्लियर, बीडब्ल्यूएक्सटी, जनरल एटॉमिक्स, रेडिएंट इंडस्ट्रीज और वेस्टिंगहाउस जैसी कंपनियां काम करेंगी।
माइक्रोरिएक्टर पारंपरिक परमाणु बिजलीघरों की तुलना में बेहद छोटे होते हैं। प्रस्तावित प्रणालियां सामान्यतः 20 मेगावाट से कम क्षमता की होंगी। इनका सबसे बड़ा सैन्य फायदा यह है कि ये स्थानीय बिजली ग्रिड से स्वतंत्र होकर लंबे समय तक बिजली उपलब्ध करा सकती हैं। सेना का मानना है कि युद्ध, साइबर हमले, प्राकृतिक आपदा या ग्रिड में बड़ी खराबी की स्थिति में भी सैन्य ठिकानों की संचार व्यवस्था, कंप्यूटर प्रणालियां, रडार और अन्य महत्वपूर्ण सुविधाएं चलती रह सकती हैं।
इस परियोजना का एक और लक्ष्य अमेरिका के परमाणु उद्योग को बढ़ावा देना है। भुगतान भी सीधे पूरी राशि देने के बजाय तकनीकी उपलब्धियां हासिल करने के बाद चरणबद्ध तरीके से किया जाएगा। सेना कम से कम एक रिएक्टर को सितंबर 2028 तक चालू करने का लक्ष्य रख रही है।
हालांकि योजना जोखिम से मुक्त नहीं है। अमेरिकी अधिकारियों ने खुद माना है कि माइक्रोरिएक्टर तकनीक अभी विकास के दौर में है और कुछ कंपनियों के लिए परियोजना समय पर पूरा करना चुनौतीपूर्ण हो सकता है। इसलिए असली परीक्षा यह होगी कि क्या परमाणु माइक्रोरिएक्टर अमेरिकी सैन्य ठिकानों को बिजली संकट से बचाने का भरोसेमंद समाधान बन पाते हैं या यह अरबों डॉलर का महंगा प्रयोग साबित होता है।

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