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103 करोड़ का निगम घोटाला: 20 हजार पन्नों में खुली फर्जी बिलों की पूरी कहानी, 32 आरोपी कटघरे में


अभय सिंह राठौर पर मुख्य भूमिका का आरोप, ठेकेदारों से लेकर लेखा-परीक्षा तंत्र तक जांच की जद में


इंदौर/बौद्धिक प्रतिकार।

इंदौर नगर निगम के बहुचर्चित फर्जी बिल घोटाले में प्रवर्तन निदेशालय ने अब तक की बड़ी कानूनी कार्रवाई करते हुए विशेष धन शोधन निवारण अधिनियम अदालत, इंदौर में 32 आरोपियों के खिलाफ 20 हजार पन्नों से अधिक की अभियोजन शिकायत दाखिल कर दी है। ईडी ने यह शिकायत 24 जुलाई 2026 को दाखिल की। जांच में नगर निगम के खजाने से करीब 103.42 करोड़ रुपये की कथित हेराफेरी सामने आई है।



कौन-कौन जांच के घेरे में?


ईडी के अनुसार आरोपियों में नगर निगम के अधिकारी, ठेकेदार लाभार्थी, स्थानीय निधि लेखा कार्यालय और निवासी लेखा-परीक्षा कार्यालय से जुड़े अधिकारी तथा निजी व्यक्ति शामिल हैं। यानी मामला केवल कुछ ठेकेदारों या इंजीनियरों तक सीमित नहीं रहा, बल्कि उस पूरी व्यवस्था की भूमिका जांच के दायरे में आई है, जिसके जरिए फर्जी दस्तावेजों को आगे बढ़ाकर सरकारी भुगतान कराया गया।


मामले में ईडी ने अभय सिंह राठौर, मोहम्मद जाकिर और राहुल बडेरा को गिरफ्तार किया है। ईडी ने अभय सिंह राठौर को कथित तौर पर इस पूरे मामले का प्रमुख साजिशकर्ता बताया है। तीनों की गिरफ्तारी 1 जून 2026 को धन शोधन निवारण अधिनियम के तहत की गई थी।


फर्जी काम, फर्जी माप और फर्जी बिल


जांच में सामने आया कि जिन कामों के नाम पर नगर निगम से भुगतान कराया गया, उनमें कुछ काम जमीन पर हुए ही नहीं थे, जबकि कुछ ऐसे काम थे जो पहले ही पूरे हो चुके थे। इसके बावजूद उनके नाम पर दोबारा भुगतान निकालने का आरोप है।


ईडी की जांच के मुताबिक इसके लिए जाली कार्यादेश, फर्जी माप पुस्तिकाएं, झूठे पूर्णता प्रमाण-पत्र, बदली हुई नस्ती और अन्य कूटरचित दस्तावेजों का इस्तेमाल किया गया। इन दस्तावेजों के आधार पर बिल तैयार हुए और फिर नगर निगम के खजाने से सरकारी धन बाहर गया।


20 ठिकानों पर छापे, करोड़ों की संपत्ति सामने


ईडी ने 5 और 6 अगस्त 2024 को 20 ठिकानों पर तलाशी ली थी। कार्रवाई में नकदी, बैंक खातों की रकम, सावधि जमा, डीमैट खाते, म्यूचुअल फंड सहित करीब 22.04 करोड़ रुपये की संपत्ति जब्त अथवा फ्रीज की गई थी। इसके बाद मध्यप्रदेश और उत्तरप्रदेश में स्थित 52 अचल संपत्तियां, जिनका मूल्य करीब 37.14 करोड़ रुपये बताया गया, कुर्क की गईं।


इस तरह मामले में अब तक 59.18 करोड़ रुपये की संपत्ति कुर्क, जब्त या फ्रीज की जा चुकी है। इनमें आवासीय मकान, व्यावसायिक संपत्तियां, भूखंड और कृषि भूमि शामिल हैं।


अभय राठौर के खिलाफ क्या आरोप?


ईडी की जांच में अभय सिंह राठौर की भूमिका को महत्वपूर्ण माना गया है। एजेंसी का आरोप है कि फर्जी कार्यादेश और बिलों को तैयार कराने तथा सरकारी धन की कथित हेराफेरी और उसके बाद धन को अलग-अलग माध्यमों से खपाने में उसकी केंद्रीय भूमिका थी।


हालांकि यह महत्वपूर्ण है कि ईडी के आरोप अभी न्यायिक परीक्षण के अधीन हैं। किसी आरोपी को अदालत द्वारा दोषी ठहराए जाने तक उसे कानूनी रूप से दोषी नहीं माना जा सकता।


सरकारी खजाने से निकला पैसा कहां गया?


ईडी के अनुसार कथित तौर पर निकाली गई रकम का एक हिस्सा नकद निकाला गया और ठेकेदारों, अधिकारियों तथा अन्य लाभार्थियों के बीच बांटे जाने का आरोप है। कुछ रकम संबंधित या सहयोगी संस्थाओं के माध्यम से कारोबार के लेन-देन के रूप में घुमाई गई और फिर चल-अचल संपत्तियां खरीदने तथा निजी खर्चों में इस्तेमाल किए जाने की बात जांच में सामने आई है।


अब आगे क्या?


विशेष पीएमएलए अदालत ने अभियोजन शिकायत पर संज्ञान लेते हुए आरोपियों को नोटिस और समन जारी किए हैं। ईडी ने कुर्क, जब्त और फ्रीज की गई संपत्तियों को कानून के तहत जब्त करने की मांग भी की है। अब अदालत में यह तय होगा कि जांच एजेंसी द्वारा लगाए गए आरोप और प्रस्तुत साक्ष्य कानूनी कसौटी पर कितने टिकते हैं।


सबसे बड़ा सवाल यही है—103.42 करोड़ रुपये के कथित फर्जी भुगतान के दौरान इतनी बड़ी संख्या में दस्तावेज तैयार हुए, बिल चले, माप पुस्तिकाएं बनीं और भुगतान हुए, तो नगर निगम की पूरी स्वीकृति और लेखा-परीक्षा व्यवस्था ने इसे समय रहते क्यों नहीं पकड़ा?

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